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विश्व जैव विविधता दिवसः चंबल में बढ़े, दुनिया में संकट में पड़े जीव-जंतु...मिल रहा ईको टूरिज्म को बढ़ावा
Thu, 22 May 2025 10:06 AM IST
धीरेन्द्र सिंह
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Thu, 22 May 2025 10:06 AM IST
सार
प्रकृति के साथ सामंजस्य और सतत विकास थीम पर बृहस्पतिवार को विश्व जैव विविधता दिवस मनाया जाएगा। डकैतों के रहस्य और रोमांच से भरी चंबल की प्राकृतिक खूबसूरती में अनोखी जैव विविधता चार चांद लगा देती है। यहां आने वाले विदेशी सैलानी और विशेषज्ञ भी इससे अचरज में पड़ जाते हैं।
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चंबल बर्ड सेंक्चुअरी में पक्षी।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
वर्ष 2015 में चंबल सफारी जरार में आयोजित हुए बर्ड फेस्टिवल में बर्ड फेयर के जनक टिम अपलेटन जैसे विशेषज्ञ चंबल की प्राकृतिक खूबसूरती के मुरीद हो गए। दुनिया की दुर्लभ चिड़ियां देखकर अचरज में पड़े जिम अपलेटन ने संकटग्रस्त इंडियन स्कीमर के संरक्षण के लिए चंबल नदी को मुफीद बताया। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी की परवीन शेख को मिले प्रोजेक्ट और वन विभाग के प्रयास से इंडियन स्कीमर की आबादी चंबल नदी में सालभर में 740 से बढ़कर 843 हो गई है।
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बाह के रेंजर उदय प्रताप सिंह ने बताया कि दुनिया की 80 फीसदी से ज्यादा आबादी चंबल नदी में है। चंबल के टापू पर 120 नेस्ट में इंडियन स्कीमर ने करीब 500 से ज्यादा अंडे दिए हैं, जिनसे अब तक 134 चूजे निकले हैं। प्रिटिनकॉल, थिकनी, ब्लैक बेलीड टर्न, रिवर टर्न जैसी चिड़ियां भी प्रजनन कर रहीं हैं। चंबल का पानी ऐसा है कि 5 अक्तूबर 2009 में डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित कर यहां संरक्षण किया जा रहा है। सालभर में इनकी आबादी 96 से बढ़ कर 111 हो गई है। दुर्लभ जलीय जीव, चिड़ियों और वन्य जीवों की बजह से ईको टूरिज्म को बढ़ावा मिल रहा है। नंदगवां में इंटर प्रिटेशन सेंटर बना कर ऊंट सफारी, टेंट सिटी जैसे संसाधन विकसित किए जा रहे हैं।
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44 साल में 250 से बढ़कर 2500 हुए घड़ियाल
दुनिया में दुर्लभ हुए घड़ियालों के संरक्षण के लिए 1979 में चंबल नदी को चुना गया। 1981 में जब संरक्षण का काम शुरू हुआ, तब घड़ियालों की संख्या 250 थी। 44 सालों में घड़ियालों की संख्या 2,456 हो गया है। रेंजर उदय प्रताप सिंह ने बताया कि पहले बाह से घड़ियालों के अंडे लखनऊ प्रजनन केंद्र ले जाए जाते थे। घड़ियाल शिशु नदी में छोड़े जाते थे। अब नदी क्षेत्र में ही नेस्टिंग और हैचिंग होने लगी है।
दुनिया में दुर्लभ हुए घड़ियालों के संरक्षण के लिए 1979 में चंबल नदी को चुना गया। 1981 में जब संरक्षण का काम शुरू हुआ, तब घड़ियालों की संख्या 250 थी। 44 सालों में घड़ियालों की संख्या 2,456 हो गया है। रेंजर उदय प्रताप सिंह ने बताया कि पहले बाह से घड़ियालों के अंडे लखनऊ प्रजनन केंद्र ले जाए जाते थे। घड़ियाल शिशु नदी में छोड़े जाते थे। अब नदी क्षेत्र में ही नेस्टिंग और हैचिंग होने लगी है।
दिखा था भेड़िया, वन्य जीव भी बढ़ा रहे कुनबा
पिछले दिनों नंदगवां के चंबल के बीहड़ में भेड़िया का दिखना सुखद आश्चर्य रहा। इतना ही नहीं 40 साल बाद चंबल में लौटे तेंदुए 5 साल में 34 से बढ़कर 52 हो गए हैं। रेंजर उदय प्रताप सिंह ने बताया कि राजस्थान से सटे बीहड़ में काले और चितकबरे हिरनों का कुनबा 850 से बढ़कर 900 के करीब हो गया है। जबकि इटावा से सटे उदयपुर खुर्द क्षेत्र में 100 से ज्यादा सांभर देखे जा रहे हैं।
पिछले दिनों नंदगवां के चंबल के बीहड़ में भेड़िया का दिखना सुखद आश्चर्य रहा। इतना ही नहीं 40 साल बाद चंबल में लौटे तेंदुए 5 साल में 34 से बढ़कर 52 हो गए हैं। रेंजर उदय प्रताप सिंह ने बताया कि राजस्थान से सटे बीहड़ में काले और चितकबरे हिरनों का कुनबा 850 से बढ़कर 900 के करीब हो गया है। जबकि इटावा से सटे उदयपुर खुर्द क्षेत्र में 100 से ज्यादा सांभर देखे जा रहे हैं।