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Agra News: वामन अवतार और कान्हा के प्रकट होने का प्रसंग सुनाया
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बटेश्वर भगवत कथा मे भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव की झांकी
- फोटो : कटकुइयां कला में आयोजित चौपाल में स्टॉल का निरीक्षण करती डीएम।
बटेश्वर। बटेश्वर तीर्थ के खांद स्थित स्कूल में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन कथा व्यास शास्त्री नीतू यादव ने भगवान के वामन अवतार, राजा बलि और श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का प्रसंग सुनाया।
कथा के दौरान पंडाल नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की, के जयकारों से गूंज उठा। कथा स्थल को गुब्बारों और मनमोहक फूलों से गोकुलधाम की तरह सजाया गया था। बाल कृष्ण के दिव्य स्वरूप की आरती उतारकर उन्हें पालने में झुलाया गया। कथाव्यास ने श्रद्धालुओं को बताया कि भगवान की भक्ति के लिए सरलता और समर्पण अनिवार्य है। मुख्य यजमान शौकीराम व श्री देवी, कथा आयोजक मुन्नेश यादव आदि मौजूद रहे।
गलती हो जाए तो प्रायश्चित जरूर करें
बाह। ठाकुर जयनरायन मंदिर बाह में मंगलवार को दूसरे दिन भागवत कथा का प्रवचन करते हुए आचार्य माधव मयंक तिवारी ने कहा कि मनुष्य से गलती हो जाना बड़ी बात नहीं, लेकिन ऐसा होने पर समय रहते सुधार और प्रायश्चित जरूरी है। ऐसा नहीं हुआ तो गलती पाप की श्रेणी में आ जाती है। उन्होंने कहा कि द्वापर युग में धर्मराज युधिष्ठिर ने सूर्यदेव की उपासना कर अक्षयपात्र प्राप्त किया। हमारे पूर्वजों ने सदैव पृथ्वी का पूजन व रक्षण किया। इसके बदले प्रकृति ने मानव का रक्षण किया। उन्होंने कहा कि आज के समय में लोगों को अध्यात्म और संस्कारों से जुड़ने की आवश्यकता है।
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कथा के दौरान पंडाल नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की, के जयकारों से गूंज उठा। कथा स्थल को गुब्बारों और मनमोहक फूलों से गोकुलधाम की तरह सजाया गया था। बाल कृष्ण के दिव्य स्वरूप की आरती उतारकर उन्हें पालने में झुलाया गया। कथाव्यास ने श्रद्धालुओं को बताया कि भगवान की भक्ति के लिए सरलता और समर्पण अनिवार्य है। मुख्य यजमान शौकीराम व श्री देवी, कथा आयोजक मुन्नेश यादव आदि मौजूद रहे।
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गलती हो जाए तो प्रायश्चित जरूर करें
बाह। ठाकुर जयनरायन मंदिर बाह में मंगलवार को दूसरे दिन भागवत कथा का प्रवचन करते हुए आचार्य माधव मयंक तिवारी ने कहा कि मनुष्य से गलती हो जाना बड़ी बात नहीं, लेकिन ऐसा होने पर समय रहते सुधार और प्रायश्चित जरूरी है। ऐसा नहीं हुआ तो गलती पाप की श्रेणी में आ जाती है। उन्होंने कहा कि द्वापर युग में धर्मराज युधिष्ठिर ने सूर्यदेव की उपासना कर अक्षयपात्र प्राप्त किया। हमारे पूर्वजों ने सदैव पृथ्वी का पूजन व रक्षण किया। इसके बदले प्रकृति ने मानव का रक्षण किया। उन्होंने कहा कि आज के समय में लोगों को अध्यात्म और संस्कारों से जुड़ने की आवश्यकता है।
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