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Agra News: मुंशी प्रेमचंद की कहानियों वाला बटेश्वर मेला तंत्र की उपेक्षा से बना मामूली हाट
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बटेश्वर पशु मेला. के. लिए मेला क्षेत्र मे डेरा डाले दुकानदार बटेश्वर पशु मेला क्षेत्र मे डेरा
बटेश्वर। मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में जीवंत होने वाला और मुगल काल से लेकर ब्रिटिश हुकूमत तक अपनी भव्यता के लिए दुनिया भर में मशहूर उत्तर भारत का ऐतिहासिक बटेश्वर मेला आज कुप्रबंधन का शिकार है।
करीब 380 साल पुराना यह लोक एवं पशु मेला कभी हाथियों, घोड़ों और किसानों के बैलों की खरीद-बिक्री का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था। पिछले कई वर्षों से दुनिया में विख्यात यह मेला प्रशासनिक उदासीनता के चलते महज कुछ ही किलोमीटर के दायरे में सिमट कर हाट का रूप ले चुका है।
इतिहासकारों की मानें तो यह मेला करीब 380 साल पुराना है। बीते वर्षों में दीपावली की दूज से मेले का शुभारंभ होता था, तो लाखों की संख्या में पहले गाय व बैल पहुंचते थे। इनका मेला बटेश्वर पर सड़क किनारे व किसानों की जमीन पर लगता था, लेकिन बैलों की जगह अब ट्रैक्टर ने ले ली है।
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असमंजस में रहते हैं व्यापारी
तीन दशक पहले तक मेला आयोजन की तारीख निर्धारित होती थी। जिला पंचायत को इसके प्रचार-प्रसार की जरूरत नहीं पड़ती थी। अब हर साल नई तिथि की घोषणा होती है। इस कारण व्यापारी भी असमंजस में रहता है। जिला पंचायत इसका प्रचार-प्रसार भी नहीं करती है। बटेश्वर निवासी 75 वर्षीय बुजुर्ग जयप्रकाश शास्त्री ने बताया कि उत्तर भारत का प्रमुख तीर्थस्थल बटेश्वर देश में ही नहीं, विदेश तक में अपनी पहचान रखता है। कार्तिक पूर्णिमा पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। सब कुछ होने के बाद भी अभी तक लोक एवं पशु मेले को राज्य स्तर का दर्जा नहीं मिला है।
रोडवेज बसों का संचालन बंद : बटेश्वर निवासी 75 वर्षीय रनवीर सिंह का कहना है कि करीब 20 दिन तक चलने वाले पशु एवं लोक मेले में लाखों श्रद्धालुओं के अलावा हजारों की संख्या में व्यापारी आते हैं, लेकिन सरकार ने इनके आने-जाने की कोई व्यवस्था नहीं की है। पहले मेला अवधि में निजी बसों के अलावा रोडवेज बसों का संचालन होता था, वह भी कई वर्षों से बंद है। खेतों में दूर-दराज से आए ऊंट व्यापारियों के साथ-साथ दुकानदारों ने भी अपना डेरा डालना शुरू कर दिया है। पशु व्यापारियों और दुकानदारों ने जिला पंचायत प्रशासन से मेला क्षेत्र में पेयजल, प्रकाश और सुरक्षा इंतजाम कराने की गुहार लगाई है।
11 से 28 नवंबर तक लगेगा मेला
जिला पंचायत आगरा के अपर मुख्य अधिकारी मुकेश जैन ने बताया कि इस वर्ष बटेश्वर लोक एवं पशु मेले का औपचारिक शुभारंभ 11 नवंबर को विशाल दीपोत्सव के साथ किया जाएगा। यमुना नदी के सभी घाटों को दीपों की रोशनी से सजाया जाएगा। मेले का समापन 28 नवंबर को होगा।
बैलों की जगह अब ट्रैक्टर ने ले ली है। मेले में आने वाले पशुओं के गिरते स्तर में वैज्ञानिक तकनीकी भी प्रभाव डाल रही है। जैसे-जैसे तकनीकी बढ़ी, मेले में आने वाले गाय, बैल बंद हो चुके हैं। मशीनीकरण, आधुनिक यातायात और नई तकनीक के कारण पशुओं की कृषि व परिवहन में उपयोगिता घटी है। अब घोड़ों का प्रयोग मुख्य रूप से शौक के लिए ही रह गया है। - मुकेश जैन, अपर मुख्य अधिकारी (जिला पंचायत आगरा)
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करीब 380 साल पुराना यह लोक एवं पशु मेला कभी हाथियों, घोड़ों और किसानों के बैलों की खरीद-बिक्री का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था। पिछले कई वर्षों से दुनिया में विख्यात यह मेला प्रशासनिक उदासीनता के चलते महज कुछ ही किलोमीटर के दायरे में सिमट कर हाट का रूप ले चुका है।
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इतिहासकारों की मानें तो यह मेला करीब 380 साल पुराना है। बीते वर्षों में दीपावली की दूज से मेले का शुभारंभ होता था, तो लाखों की संख्या में पहले गाय व बैल पहुंचते थे। इनका मेला बटेश्वर पर सड़क किनारे व किसानों की जमीन पर लगता था, लेकिन बैलों की जगह अब ट्रैक्टर ने ले ली है।
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असमंजस में रहते हैं व्यापारी
तीन दशक पहले तक मेला आयोजन की तारीख निर्धारित होती थी। जिला पंचायत को इसके प्रचार-प्रसार की जरूरत नहीं पड़ती थी। अब हर साल नई तिथि की घोषणा होती है। इस कारण व्यापारी भी असमंजस में रहता है। जिला पंचायत इसका प्रचार-प्रसार भी नहीं करती है। बटेश्वर निवासी 75 वर्षीय बुजुर्ग जयप्रकाश शास्त्री ने बताया कि उत्तर भारत का प्रमुख तीर्थस्थल बटेश्वर देश में ही नहीं, विदेश तक में अपनी पहचान रखता है। कार्तिक पूर्णिमा पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। सब कुछ होने के बाद भी अभी तक लोक एवं पशु मेले को राज्य स्तर का दर्जा नहीं मिला है।
रोडवेज बसों का संचालन बंद : बटेश्वर निवासी 75 वर्षीय रनवीर सिंह का कहना है कि करीब 20 दिन तक चलने वाले पशु एवं लोक मेले में लाखों श्रद्धालुओं के अलावा हजारों की संख्या में व्यापारी आते हैं, लेकिन सरकार ने इनके आने-जाने की कोई व्यवस्था नहीं की है। पहले मेला अवधि में निजी बसों के अलावा रोडवेज बसों का संचालन होता था, वह भी कई वर्षों से बंद है। खेतों में दूर-दराज से आए ऊंट व्यापारियों के साथ-साथ दुकानदारों ने भी अपना डेरा डालना शुरू कर दिया है। पशु व्यापारियों और दुकानदारों ने जिला पंचायत प्रशासन से मेला क्षेत्र में पेयजल, प्रकाश और सुरक्षा इंतजाम कराने की गुहार लगाई है।
11 से 28 नवंबर तक लगेगा मेला
जिला पंचायत आगरा के अपर मुख्य अधिकारी मुकेश जैन ने बताया कि इस वर्ष बटेश्वर लोक एवं पशु मेले का औपचारिक शुभारंभ 11 नवंबर को विशाल दीपोत्सव के साथ किया जाएगा। यमुना नदी के सभी घाटों को दीपों की रोशनी से सजाया जाएगा। मेले का समापन 28 नवंबर को होगा।
बैलों की जगह अब ट्रैक्टर ने ले ली है। मेले में आने वाले पशुओं के गिरते स्तर में वैज्ञानिक तकनीकी भी प्रभाव डाल रही है। जैसे-जैसे तकनीकी बढ़ी, मेले में आने वाले गाय, बैल बंद हो चुके हैं। मशीनीकरण, आधुनिक यातायात और नई तकनीक के कारण पशुओं की कृषि व परिवहन में उपयोगिता घटी है। अब घोड़ों का प्रयोग मुख्य रूप से शौक के लिए ही रह गया है। - मुकेश जैन, अपर मुख्य अधिकारी (जिला पंचायत आगरा)