बीहड़ों के डाकुओं ने राखी बांधने के बाद छोड़ी थी बंदूक
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आगरा के बाह में 1960 में आत्मसमर्पण और जेल जाने से पहले राखी बंधवाने पर खूंखार डकैतों की आंखें छलकने की घटना की चर्चा चंबल घाटी के गांवो में रक्षाबंधन के त्योहार पर आज भी चौपालों में होती है। जेल की सलाखों के भीतर तक बहनों की डोर बंधी रही थी।
12 मई 1960 को संत विनोवा ने पिनाहट से बागियों के हृदय परिवर्तन की पद यात्रा शुरू की थी। संत विनोवा मेजर जनरल यदुनाथ सिंह के साथ निकले। 22 मई को रक्षा बंधन का पर्व था। जेल जाने से पहले संत विनोवा और यदुनाथ सिंह की मौजूदगी में प्रार्थना सभा का आयोजन हुआ।
डकैतों को कांता बहन ने टीका किया। हरि विलासी ने राखी बांधी। चंबल की घटनाओं पर नजर रखने वाले डॉ बीपी मिश्र बताते हैं कि यह पल बहुत भावुक कर देने वाला था। राखी बंधवाने वाले डकैतों की आंखो में आंसू छलक पडे़। कांता और हरिविलासी जेल तक उनके साथ गई।
रामकिशन गुप्ता ने बताया कि रक्षा बंधन पर भिंड , मुरैना, बाह, इटावा, राजाखेड़ा, धौलपुर तक के गांवों की चौपालो पर रक्षाबंधन पर इस घटना का जिक्र जरूर होता है।
विनोवा की यात्रा के ये थे पड़ाव
12 मई 1960 में पिनाहट से शुरु हुई डकैतों के हृदय परिवर्तन की यात्रा का पहला पड़ाव 13 मई को मुरैना के रछेड़ , 14 मई को अंबाह, 16 मई को पोरसा, 17 मई को नगरा, 18 मई को कनेरा, 19 मई को कदौरा में रहा। यहां पर मान सिंह, रूपा गिरोह के 19 बागियों ने संत विनोवा के समक्ष हथियार डाल दिए थे।
इन डकैतों को बांधी थी राखी
लोकमन दीक्षित, तेज सिंह, भगवान सिंह, भूप सिंह, कन्हई, बदन सिंह, पातीराम, विद्याराम, डरेलाल, मटरे, जंगजीत, राम सनेही, दुर्जन, श्रीकृष्ण, लक्ष्क्षी, मोहरमन , करन सिंह, राम दयाल, प्रभू समेत कई अन्य को राखी बाधी थी।