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एतिहासिक विरासतों को नहीं संजो पा रहा मैनपुरी
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24एमएनपी-29-मैनपुरी का ऐतिहासिक महाराजा तेज सिंह का किला
- फोटो : MAINPURI
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मैनपुरी। मयन ऋषि की तपोभूमि मैनपुरी अपने आप में एक इतिहास को समेटे हुए है। इस इतिहास की गवाह अब केवल इमारतें और तपोस्थली ही बची हैं लेकिन, मैनपुरी प्रशासन इन विरासतों को संजो नहीं सका। संरक्षण नहीं मिला तो अब ये एतिहासिक विरासतें भी ध्वस्त होने लगी हैं।
मैनपुरी का गौरवशाली इतिहास किसी परिचय का मोहताज नहीं है। मैनपुरी ने जहां आध्यात्म को अपने सीने में स्थान दिया तो वहीं स्वतंत्रता संग्राम में भी बढ़ चढ़कर प्रतिभाग किया। आज इसकी गवाह बस इमारतें, सरोवर और नदियां ही बची हैं। मैनपुरी शहर के बीचों-बीच बना महाराजा तेज सिंह का किला जहां स्वतंत्रता संग्राम की गवाही दे रहा है तो वहीं औंछा में बना च्यवन ऋषि का आश्रम और कुंड तप और त्याग की याद दिलाता है। ये वही कुंड है, जिसमें च्यवनप्राश तैयार किया गया था। भले ही च्यवनप्राश को आज पूरे देश में जाना जाता है, लेकिन च्यवन ऋषि का ये कुंड गुमनाम है।
केवल यही नहीं विधूना स्थित मार्केंडेय की तपोभूमि महाभारत काल की गवाह है। यहां पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान समय व्यतीत किया था। ये तो बस मैनपुरी की विरासत के कुछ उदाहरण हैं। यहां के जर्रे-जर्रे में एक इतिहास है, लेकिन अपने इस इतिहास और विरासत को मैनपुरी संजो नहीं पा रहा है। इसके चलते ये विरासतें धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो रही हैं। महाराजा तेजसिंह का किला जहां जर्जर हो चुका है तो वहीं च्यवन ऋषि का कुंड भी दलदल में बदल चुका है। अगर जल्द ही प्रशासन ने पहल नहीं की तो ये धरोहरें मैनपुरी से हमेशा के लिए गुमनामी में खो जाएंगी।
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आय का साधन भी बन सकती हैं विरासतें
इतिहास की विरासतों को संजोना केवल अपने इतिहास को संजोना ही नहीं बल्कि आय का साधन भी बन सकता है। अगर प्रयास किया जाए तो इन्हें पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। मैनपुरी से सटे बौद्ध तीर्थ स्थल संकिसा में कई देशों से पर्यटक आते हैं। अगर मैनपुरी में विरासतों को संजोने के साथ ही प्रयास किए जाएं तो पर्यटक यहां भी जरूर आकर्षित होंगे।
क्या कहते हैं साहित्यकार
मैनपुरी अपने आप में एक गौरवशाली इतिहास को समेटे हुए हैं। आज भी एक दर्जन से स्थल ऐसे हैं, जिनका इतिहास की किताबों में वर्णन है। अगर प्रशासन प्रयास करे तो इन्हें बेहतर किया जा सकता है।
श्रीकृष्ण मिश्र, साहित्यकार
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मैनपुरी का गौरवशाली इतिहास किसी परिचय का मोहताज नहीं है। मैनपुरी ने जहां आध्यात्म को अपने सीने में स्थान दिया तो वहीं स्वतंत्रता संग्राम में भी बढ़ चढ़कर प्रतिभाग किया। आज इसकी गवाह बस इमारतें, सरोवर और नदियां ही बची हैं। मैनपुरी शहर के बीचों-बीच बना महाराजा तेज सिंह का किला जहां स्वतंत्रता संग्राम की गवाही दे रहा है तो वहीं औंछा में बना च्यवन ऋषि का आश्रम और कुंड तप और त्याग की याद दिलाता है। ये वही कुंड है, जिसमें च्यवनप्राश तैयार किया गया था। भले ही च्यवनप्राश को आज पूरे देश में जाना जाता है, लेकिन च्यवन ऋषि का ये कुंड गुमनाम है।
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केवल यही नहीं विधूना स्थित मार्केंडेय की तपोभूमि महाभारत काल की गवाह है। यहां पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान समय व्यतीत किया था। ये तो बस मैनपुरी की विरासत के कुछ उदाहरण हैं। यहां के जर्रे-जर्रे में एक इतिहास है, लेकिन अपने इस इतिहास और विरासत को मैनपुरी संजो नहीं पा रहा है। इसके चलते ये विरासतें धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो रही हैं। महाराजा तेजसिंह का किला जहां जर्जर हो चुका है तो वहीं च्यवन ऋषि का कुंड भी दलदल में बदल चुका है। अगर जल्द ही प्रशासन ने पहल नहीं की तो ये धरोहरें मैनपुरी से हमेशा के लिए गुमनामी में खो जाएंगी।
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आय का साधन भी बन सकती हैं विरासतें
इतिहास की विरासतों को संजोना केवल अपने इतिहास को संजोना ही नहीं बल्कि आय का साधन भी बन सकता है। अगर प्रयास किया जाए तो इन्हें पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। मैनपुरी से सटे बौद्ध तीर्थ स्थल संकिसा में कई देशों से पर्यटक आते हैं। अगर मैनपुरी में विरासतों को संजोने के साथ ही प्रयास किए जाएं तो पर्यटक यहां भी जरूर आकर्षित होंगे।
क्या कहते हैं साहित्यकार
मैनपुरी अपने आप में एक गौरवशाली इतिहास को समेटे हुए हैं। आज भी एक दर्जन से स्थल ऐसे हैं, जिनका इतिहास की किताबों में वर्णन है। अगर प्रशासन प्रयास करे तो इन्हें बेहतर किया जा सकता है।
श्रीकृष्ण मिश्र, साहित्यकार