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कंप्यूटर प्रयोगशाला में शिक्षक छाप रहे मार्कशीट, डिग्री
अंकुर पंडित
Updated Fri, 26 Dec 2014 02:07 AM IST
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गैर हिंदी भाषी राज्यों और देशों के लिए हिंदी शिक्षक तैयार करने वाली देश की इकलौती स्वायत्त संस्था केंद्रीय हिंदी संस्थान में शिक्षक ही मार्कशीट और डिग्री छाप रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी विषय के शिक्षक यह गोपनीय कार्य कंप्यूटर प्रयोगशाला में करते हैं। न तो विशेष तरह की स्याही और न होलोग्राम और न ही किसी तरह के छिपे रहने वाले कोड। हाल ही में हुए भौतिक सत्यापन में हिंदी संस्थान की 132 मार्कशीट फर्जी पाई गई थी। जांच चल रही है, यह आंकड़ा एक हजार से पार जा सकता है।
प्रवेश एवं परीक्षा विभाग के प्रशासनिक अधिकारी रतन बाबू ने 29 अगस्त को निदेशक को पत्र लिखकर इस मामले पर चिंता जताई थी। पत्र में कहा, कंप्यूटर प्रयोगशाला में मार्कशीट एवं सर्टिफिकेट प्रिंटिंग जैसे गोपनीय कार्यों को कराया जाना उचित नहीं है। यह कार्य परीक्षा विभाग में ही कराया जाए। इस पत्र के बाद प्रवेश समिति संयोजक ने कहा कि प्रिंटिंग परीक्षा विभाग में ही हो, ऐसा न होने से कई विसंगतियां आती हैं। लेकिन कुलसचिव चंद्रकांत त्रिपाठी ने इस कार्य को कंप्यूटर प्रयोगशाला में ही कराने का निर्णय लिया और निदेशक ने इस पर अपनी लिखित सहमति भी दी। हालांकि इसके पीछे कारण नहीं बताया।
संस्थान पर सवाल
पूरा मामला निदेशक प्रो. मोहन और कुलसचिव चंद्रकांत त्रिपाठी के संज्ञान में है। हर दूसरे महीने सत्यापन में फर्जी मार्कशीट पकड़ी जा रही हैं, फिर भी परीक्षा विभाग की जगह प्रयोगशाला में मार्कशीट प्रिंट कराई जा रही हैं। आखिर क्यों?
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कई दिन पहले एक कर्मचारी की पत्नी ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को शिकायत कर 50 हजार रुपये में फर्जी मार्कशीट बेचे जाने का आरोप यहां के एक अधिकारी पर लगाया था, इसकी जांच भी हो रही है। तो क्या यहां की फर्जी मार्कशीट के रैकेट का केंद्र संस्थान ही है?
पिछले 20 सालों का डाटा सर्वर पर डाला जाएगा। मार्कशीट पर फोटो और होलोग्राम भी लगेगा। पहले आंध्र प्रदेश और उड़ीसा के केंद्रों पर धांधली थी। कोई रैकेट काम कर रहा है। इस बार प्रवेश परीक्षा बंगाल में करा दी। सब ठीक हो गया।
प्रो. मोहन, निदेशक
ऐसी जितनी भी मार्कशीट पकड़ी जाती हैं, उसमें संबंधित विभाग को विधिक कार्रवाई के लिए कहा जाता है। रतन बाबू मेरी और संस्थान की छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं।
चंद्रकांत त्रिपाठी, कुलसचिव
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प्रवेश एवं परीक्षा विभाग के प्रशासनिक अधिकारी रतन बाबू ने 29 अगस्त को निदेशक को पत्र लिखकर इस मामले पर चिंता जताई थी। पत्र में कहा, कंप्यूटर प्रयोगशाला में मार्कशीट एवं सर्टिफिकेट प्रिंटिंग जैसे गोपनीय कार्यों को कराया जाना उचित नहीं है। यह कार्य परीक्षा विभाग में ही कराया जाए। इस पत्र के बाद प्रवेश समिति संयोजक ने कहा कि प्रिंटिंग परीक्षा विभाग में ही हो, ऐसा न होने से कई विसंगतियां आती हैं। लेकिन कुलसचिव चंद्रकांत त्रिपाठी ने इस कार्य को कंप्यूटर प्रयोगशाला में ही कराने का निर्णय लिया और निदेशक ने इस पर अपनी लिखित सहमति भी दी। हालांकि इसके पीछे कारण नहीं बताया।
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संस्थान पर सवाल
पूरा मामला निदेशक प्रो. मोहन और कुलसचिव चंद्रकांत त्रिपाठी के संज्ञान में है। हर दूसरे महीने सत्यापन में फर्जी मार्कशीट पकड़ी जा रही हैं, फिर भी परीक्षा विभाग की जगह प्रयोगशाला में मार्कशीट प्रिंट कराई जा रही हैं। आखिर क्यों?
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कई दिन पहले एक कर्मचारी की पत्नी ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को शिकायत कर 50 हजार रुपये में फर्जी मार्कशीट बेचे जाने का आरोप यहां के एक अधिकारी पर लगाया था, इसकी जांच भी हो रही है। तो क्या यहां की फर्जी मार्कशीट के रैकेट का केंद्र संस्थान ही है?
पिछले 20 सालों का डाटा सर्वर पर डाला जाएगा। मार्कशीट पर फोटो और होलोग्राम भी लगेगा। पहले आंध्र प्रदेश और उड़ीसा के केंद्रों पर धांधली थी। कोई रैकेट काम कर रहा है। इस बार प्रवेश परीक्षा बंगाल में करा दी। सब ठीक हो गया।
प्रो. मोहन, निदेशक
ऐसी जितनी भी मार्कशीट पकड़ी जाती हैं, उसमें संबंधित विभाग को विधिक कार्रवाई के लिए कहा जाता है। रतन बाबू मेरी और संस्थान की छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं।
चंद्रकांत त्रिपाठी, कुलसचिव