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शरद पूर्णिमा पर ताज की खूबसूरती पर लगेंगे चार चांद, दीदार के लिए सैलानी बेकरार

Wed, 24 Oct 2018 11:52 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा Updated Wed, 24 Oct 2018 11:52 AM IST
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Taj Mahal view on sharad purnima 2018 full moon night
चांदनी रात में ताजमहल का दीदार - फोटो : अमर उजाला
शरद पूर्णिमा पर जब चांद अपने पूरे शबाब पर होगा, तब धवल चांदनी में नहाए संगमरमरी ताजमहल की खूबसूरती में चार चांद लग जाएंगे। इस दृश्य को देखने के लिए सैलानी बेकरार हैं। शरद पूर्णिमा के चांद की रोशनी में 400 सैलानी दीदार ए ताज के लिए आगरा आए हैं। 
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सभी 8 ग्रुप में पूरे 400 सैलानी रात 12:30 बजे तक ताजमहल का दीदार करेंगे। ताज के अंदर 400 सैलानी होंगे, जबकि ताजगंज के होटलों की छतों पर शरद पूर्णिमा पर ताज दिखाने के लिए अलग व्यवस्थाएं की गई हैं। ज्यादातर होटलों के रूफ टॉप से सैलानी ताज का दीदार करेंगे।
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एएसआई के माल रोड स्थित कार्यालय पर मंगलवार को शरद पूर्णिमा पर नाइटव्यू के लिए टिकट खरीदने वालों का तांता लगा रहा। दोपहर 12 बजे तक 400 में से 380 टिकट तो बिक चुके थे, जबकि लंबी कतार में लोग नाइट व्यू का टिकट लेने के लिए खड़े रहे। चंद मिनटों बाद ही यहां हाउस फुल का बोर्ड लगा देखा तो पर्यटक मायूस हो उठे। 
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मंगलवार को 262 सैलानियों ने निहारा ताज

पूर्णिमा से एक दिन पहले 6 ग्रुप में 262 सैलानियों ने ताजमहल का दीदार किया। शिल्पग्राम से सैलानियों को कड़ी सुरक्षा में ताजमहल पूर्वी गेट से प्रवेश दिया गया। 30 मिनट का समय हर ग्रुप को ताजमहल देखने के लिए तय रहा। ताजमहल के नाइटव्यू के लिए आगरा आए सैलानियों में से अधिकांश ने अपने होटलों की छत से पूर्णिमा से एक दिन पहले ताज की झलक देखी।

कभी ताज के अंदर ही सजती थीं दुकानें

ताजमहल में 1984 से पहले चमकी का मेला शरद पूर्णिमा को लगता था। तब ताजमहल के अंदर लाखों लोगों की रात में मौजूदगी के कारण अंदर ही दुकानें लगती थीं। ताज के फोरकोर्ट में बने कमरों में स्थायी दुकानें थीं, जबकि पार्क में बल्लियों और कपड़ों से अस्थाई दुकानें लगाई जाती थी। तब ताज का प्रवेश टिकट रॉयल गेट पर ही मिलता था और वहीं इसकी चेकिंग होती थी। 

ताज के अंदर पूरी रात मेला रहता था और ताज के उत्तरी ओर यानी यमुना किनारे की ओर रेलिंग हटाकर फ्रीगंज से लकड़ी के स्लीपर से अस्थायी सीढ़ियां बनाई जाती थीं। यहां से मुख्य गुंबद से लोग नीचे उतरते थे, जबकि प्रवेश चमेली फर्श की स्थायी सीढ़ियों से ही होता था। 
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