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शीतला अष्टमी: ज्येष्ठा नक्षत्र में रंग पंचमी के साथ होगा मां शीतला का पूजन
Thu, 01 Apr 2021 11:03 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Thu, 01 Apr 2021 11:03 AM IST
सार
- बच्चों की दीर्घायु और आरोग्य के लिए की जाती है पूजा
- शीतला माता का व्रत या बसौड़ा दो अप्रैल (शुक्रवार) को मनाया जाएगा
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माता शीतला देवी मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बच्चों की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए रखा जाने वाला शीतला माता का व्रत या बसौड़ा दो अप्रैल (शुक्रवार) को मनाया जाएगा। इस दिन माता को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। इसी भोजन को स्वयं भी ग्रहण करते हैं।
ज्योतिषाचार्य पूनम वार्ष्णेय ने बताया कि इसी दिन श्रीरंग पंचमी भी है। रंग पंचमी के दिन खेली गई होली देवताओं को समर्पित मानी जाती है। लोग अबीर गुलाल को श्रीकृष्ण व राधारानी के चरणों में अर्पित करके खुद भी रंग, गुलाल उड़ाते हैं। बसौड़ा पर्व पर ज्येष्ठा नक्षत्र में वरियान योग, मालव्य योग, बुधादित्य योग बन रहे हैं, जोकि शुभ हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन शीतला माता की पूजा विधि विधान से करना चाहिए। इससे छोटे बच्चों को आरोग्य की प्राप्ति होती है। शीतला माता के आशीर्वाद से चेचक, खसरा एवं नेत्र विकार ठीक होते हैं। बच्चों को दीर्घायु प्राप्त होती है।
शीतला माता का स्वरूप: स्कंद पुराण के अनुसार, शीतला माता शक्ति का अवतार हैं। उनके हाथों में कलश, सूप, नीम के पत्ते व मार्जन (झाड़ू) होती है। गर्दभ की सवारी पर अभय मुद्रा में हैं। कलश से स्वास्थ्यवर्धक जल, नीम से विषाणु नाशक और सूप व झाड़ू से कीटाणुओं को साफ कर देती हैं।
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पूजा की विधि
प्रात: काल पूजा की थाली में दही, पूआ, पूड़ी, बाजरा, मीठे चावल, गुड़, मठरी भोग के लिए रखें। मां की पूजा हल्दी, अक्षत, कलावा, चने की दाल, लोटे में जल, गूलरी की माला से करें। इसके बाद भोग लगाएं। पूजा के उपरांत होलिका दहन वाले स्थल पर जल व भोग अर्पित करें। गाय को गुड़ व भोग खिलाएं।
पूजा का समय: सूर्योदय से लेकर सुबह 10:30 बजे तक।
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ज्योतिषाचार्य पूनम वार्ष्णेय ने बताया कि इसी दिन श्रीरंग पंचमी भी है। रंग पंचमी के दिन खेली गई होली देवताओं को समर्पित मानी जाती है। लोग अबीर गुलाल को श्रीकृष्ण व राधारानी के चरणों में अर्पित करके खुद भी रंग, गुलाल उड़ाते हैं। बसौड़ा पर्व पर ज्येष्ठा नक्षत्र में वरियान योग, मालव्य योग, बुधादित्य योग बन रहे हैं, जोकि शुभ हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन शीतला माता की पूजा विधि विधान से करना चाहिए। इससे छोटे बच्चों को आरोग्य की प्राप्ति होती है। शीतला माता के आशीर्वाद से चेचक, खसरा एवं नेत्र विकार ठीक होते हैं। बच्चों को दीर्घायु प्राप्त होती है।
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शीतला माता का स्वरूप: स्कंद पुराण के अनुसार, शीतला माता शक्ति का अवतार हैं। उनके हाथों में कलश, सूप, नीम के पत्ते व मार्जन (झाड़ू) होती है। गर्दभ की सवारी पर अभय मुद्रा में हैं। कलश से स्वास्थ्यवर्धक जल, नीम से विषाणु नाशक और सूप व झाड़ू से कीटाणुओं को साफ कर देती हैं।
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पूजा की विधि
प्रात: काल पूजा की थाली में दही, पूआ, पूड़ी, बाजरा, मीठे चावल, गुड़, मठरी भोग के लिए रखें। मां की पूजा हल्दी, अक्षत, कलावा, चने की दाल, लोटे में जल, गूलरी की माला से करें। इसके बाद भोग लगाएं। पूजा के उपरांत होलिका दहन वाले स्थल पर जल व भोग अर्पित करें। गाय को गुड़ व भोग खिलाएं।
पूजा का समय: सूर्योदय से लेकर सुबह 10:30 बजे तक।