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श्राद्ध कल से, बाजारों में खरीदारी के लिए भीड़
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मैनपुरी। कल से पितृ पक्ष की शुरुआत हो रही है। कोरोना संक्रमण के चलते इस बार सामूहिक कार्यक्रम नहीं होंगे। घरों में ही पितरों को तर्पण दिया जाएगा। इसके लिए घरों में तैयारी शुरू हो गई है। श्राद्ध दो सितंबर से 17 सितंबर तक चलेंगे। कोरोना महामारी के कारण घरों पर ब्राह्मण भोज कम होने की संभावना है। मंगलवार को लोगों ने श्राद्ध के लिए बाजारों से जरूरी सामान खरीदा।
श्राद्ध का महत्व
आचार्य रामानंदन बताते हैं कि हिंदू धर्म में वैदिक परंपरा के अनुसार अनेक रीति-रिवाज, व्रत-त्योहार व परंपराएं मौजूद हैं। अंत्येष्टि को अंतिम संस्कार माना जाता है। अंत्येष्टि के बाद भी कुछ ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें मृतक के संबंधी विशेषकर संतान को करना होता है। श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक है। वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है लेकिन भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक पूरा पखवाड़ा श्राद्ध कर्म करने का विधान है। इसलिए अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के इस पर्व को श्राद्ध कहते हैं।
किस दिन करें पूर्वजों का श्राद्ध
वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या को पितरों की शांति के लिए पिंड दान या श्राद्ध कर्म किये जा सकते हैं लेकिन पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का महत्व अधिक माना जाता है। पितृ पक्ष में किस दिन पूर्वजों का श्राद्ध करें इसके लिए शास्त्र सम्मत विचार यह है कि जिस पूर्वज, पितर या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि याद हो तो पितृपक्ष में पड़ने वाली तिथि को ही उनका श्राद्ध करना चाहिए। यदि देहावसान की तिथि ज्ञात न हो तो आश्विन अमावस्या को श्राद्ध किया जा सकता है। इसे सर्वपितृ अमावस्या भी इसलिए कहा जाता है। समय से पहले यानि जिन परिजनों की किसी दुर्घटना अथवा आत्महत्या आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। पिता के लिए अष्टमी तो माता के लिये नवमी की तिथि श्राद्ध करने के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
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श्राद्ध के नियम
-पितृपक्ष में रोज तर्पण करें। तर्पण में दूध, पानी, जौ, चावल और गंगाजल का प्रयोग करें।
-हर रोज पिंड दान करें। श्राद्ध कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिलाकर पिंड बनाएं।
-शुभ कार्य, विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान नहीं किए जाएंगे, हालांकि, देवताओं की नित्य पूजा करें।
-रंगीन फूलों का इस्तेमाल ना करें।
-पितृपक्ष में चना, मसूर, बैंगन, हींग, शलजम, मांस, लहसुन, प्याज और काला नमक भी न खाएं।
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श्राद्ध का महत्व
आचार्य रामानंदन बताते हैं कि हिंदू धर्म में वैदिक परंपरा के अनुसार अनेक रीति-रिवाज, व्रत-त्योहार व परंपराएं मौजूद हैं। अंत्येष्टि को अंतिम संस्कार माना जाता है। अंत्येष्टि के बाद भी कुछ ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें मृतक के संबंधी विशेषकर संतान को करना होता है। श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक है। वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है लेकिन भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक पूरा पखवाड़ा श्राद्ध कर्म करने का विधान है। इसलिए अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के इस पर्व को श्राद्ध कहते हैं।
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किस दिन करें पूर्वजों का श्राद्ध
वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या को पितरों की शांति के लिए पिंड दान या श्राद्ध कर्म किये जा सकते हैं लेकिन पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का महत्व अधिक माना जाता है। पितृ पक्ष में किस दिन पूर्वजों का श्राद्ध करें इसके लिए शास्त्र सम्मत विचार यह है कि जिस पूर्वज, पितर या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि याद हो तो पितृपक्ष में पड़ने वाली तिथि को ही उनका श्राद्ध करना चाहिए। यदि देहावसान की तिथि ज्ञात न हो तो आश्विन अमावस्या को श्राद्ध किया जा सकता है। इसे सर्वपितृ अमावस्या भी इसलिए कहा जाता है। समय से पहले यानि जिन परिजनों की किसी दुर्घटना अथवा आत्महत्या आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। पिता के लिए अष्टमी तो माता के लिये नवमी की तिथि श्राद्ध करने के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
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श्राद्ध के नियम
-पितृपक्ष में रोज तर्पण करें। तर्पण में दूध, पानी, जौ, चावल और गंगाजल का प्रयोग करें।
-हर रोज पिंड दान करें। श्राद्ध कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिलाकर पिंड बनाएं।
-शुभ कार्य, विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान नहीं किए जाएंगे, हालांकि, देवताओं की नित्य पूजा करें।
-रंगीन फूलों का इस्तेमाल ना करें।
-पितृपक्ष में चना, मसूर, बैंगन, हींग, शलजम, मांस, लहसुन, प्याज और काला नमक भी न खाएं।