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जानिये चार दशक पहले कैसा था सावन का उल्लास, गूंजते थे गीत-मल्हार...

Wed, 22 Jul 2020 03:35 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Wed, 22 Jul 2020 03:35 PM IST
सार

सहेलियां इकट्ठा हो जाया करती थीं, गीत-मल्हार गूंजते थे, हंसी-ठिठोली होती थी

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Sawan Speical Story Songs And Malhar
रेनू भदौरिया, समाज सेविका, बाह - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चार दशक पहले सावन का उल्लास अनूठा था। बाग-बगीचों में सहेलियां इकट्ठा हो जाया करती थीं, गीत-मल्हार गूंजते थे, हंसी-ठिठोली होती थी। मुझे याद है कि तालाब पर भुजरियां विसर्जन के मेले में नाच-गाने की महफिल सजती थी। सहेलियों के संग श्रृंगार कर घर से निकलती थी। शादी के बाद सहेलियों से मिलन की चाहत मायके खींच लाती थी। 
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मेहंदी का रिवाज पति ने बना दिया था मजाक

शादी के बाद ससुराल में पहला सावन था। सांझ ढल गई थी। हाथ पर मेहंदी लगाने को पति ने प्रस्ताव रखा तो खुशी-खुशी लगवाने बैठ गई। उन्होंने मजाक में मेहंदी की जगह पर हाथों पर गाय का गोबर लेप दिया। यह मजाक यादगार लम्हों में शामिल हो गया।
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महीनों पहले से मायके जाने की होती थी तैयारी
शादी के बाद सावन में मायके जाने के लिए महीनों से तैयारी होती थी। शादी के बाद पहली बार मायके में सहेलियों के साथ भुजरियां बोने को मिट्टी खोदने का रिवाज भी रोमांचक था।

एक गड्ढा कर लिया जाता था। साल भर में जिन युवतियों की शादी हुई होती थी, उनसे कूद कर इसे पार करने को कहा जाता था। ढंग से न कूदने पर पति का प्यार कम होने की बात बोलकर चिढ़ाती थी।            
                                       
भुजरियां विसर्जन को अब नहीं निकलतीं बेटियां                                                                        

37 साल पहले ब्याह कर बाह आई तो सावन की परंपराओं का नया आंगन मिला। सावन शुरू होते ही सास हाथ पर मेंहदी लगवा देती थी। हरी चूड़ियां पहनवा देती थीं। अब सब बदल गया है। भुजरियां विसर्जन को बेटियां भी घर से कम ही निकलती हैं। मेहंदी लगाने का रिवाज भी अब फैशन बन गया है। सावन आते ही पुरानी परंपराओं की यादों में मन डूब जाता है। - रेनू भदौरिया, समाज सेविका, बाह
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