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वृंदावन के मंदिरों में पितृ पक्ष में सांझी की धूम
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वृंदावन। पितृ पक्ष के दौरान वृंदावन के मंदिरों में आयोजित होने वालीं सांझी रचनाओं का आकर्षण देखते ही बनता है। हालांकि कोविड-19 के प्रभाव से मंदिरों के आयोजन आमजन के लिए सुलभ नहीं, पर परंपराओं का निर्वहन सुचारु है। इसी क्रम में पितृ पक्ष के दौरान आयोजित होने वाला सांझी मनोरथ बरबस ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस दौरान नगर के मंदिरों में फूलों से, रंगों द्वारा तथा पानी के ऊपर और नीचे कलात्मक सांझियां तैयार कीं जातीं हैं। वृंदावन के राधाबलभ मंदिर, भट्टजी की हवेली, राधारमण, गोपीनाथजी (वल्लभ कुल) मंदिर, शाहजहांपुर वाले मंदिर, प्रियाबल्लभ कुज्ञ व यशोदानंदन मंदिर आदि मंदिरों में सांझी मनोरथ की पुरानी परम्परा है।
सांझी की विविधताओं से उपजा आकर्षण
मंदिरों में आयोजित सांझी मनोरथ के अंतर्गत प्रभु सेवा क्रम में क्रमश: फूलों से बनी सांझी, रंग सांझी तथा पानी के ऊपर और नीचे सांझी के अंकन आकर्षण का केंद्र होते हैं। रंग सांझी तैयार करने के दौरान सूखे रंगों को, छोटे सूती कपड़े की पोटरियों द्वारा उंगलियों के संचालन से रंग छानते हुए कलात्मक बेल बूटे तैयार करते हैं तो दृश्य देखने लायक होता है। इसी तरह यह कला पानी के ऊपर तथा नीचे और अधिक आकर्षण उत्पन्न करती है। इसी क्रम में फूलों से बननी वाली कलात्मक साँझियाँ भी मानव मन को सहज ही विमोहित करतीं हैं। साँझी सेवा के दौरान आरम्भ में पुष्प साँझी ही प्रभु को निवेदित की जाती है।
राधारानी गोपियों के संग बनातीं थी सांझी
प्रसंग के अनुसार जब श्रीकृष्ण गौचारण कर लौटते तो गोधूलि बेला में राधारानी गोपिकाओं के साथ मार्ग को विभिन्न प्रकार के पुष्पों से सजा देतीं थीं। जिसे देख श्रीकृष्ण तथा ग्वाल मण्डली आनंदित होती थीं।आज भी मंदिरों में इस परम्परा का अनुकरण होता है।
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गायन में सांझी परंपरा
केवल कलागत सौन्दर्य ही नहीं इस परम्परा से जुड़ीं पदावलियों का गायन इसके महत्त्व को और अधिक बढाता है। राधाबल्लभ सम्प्रदाय के आचार्य श्रीहित सुकृतलाल गोस्वामी बताते हैं कि उपासना परम्परा के अनुसार साँझी में लीलाओं का अंकन होता है,वहीं समाज गायन के अन्तर्गत सांयकाल विभिन्न वाणीकारों द्वारा रचित पदावलियाँ गायीं जाती हैं।
लिखित परंपरा से दर्शित सांझी का गौरव
वृंदावन शोध संस्थान के शोध एवं प्रकाशन अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा बताते हैं कि सांझी मात्र कला के रूप में अभिव्यक्त परंपरा नहीं अपितु इससे जुडे़ लेखन और गायन के समृद्ध धरातल से इसका गौरव जिस वृहदता से दिखता है, वह अद्भुत है। डॉ. शर्मा बताते हैं इस समृद्ध परंपरा से जुड़े साहित्य का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी अप्रकाशित पांडुलिपियों के रुप में संस्थान संग्रह में विद्यमान है।
सुमित गोस्वामी राधारमण मंदिर के सेवायत बताते हैं कि सांझी की कला ब्रज की सबसे प्राचीन कलाओं में से एक है। इसे राधे का प्रतिरूप मानकर शाम के समय इसकी आरती होती है। पितृ पक्ष में यह उत्सव मनाया जाता है,लेकिन इसबार आम लोगों को इसके दर्शन नहीं हो सकेंगे।
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सांझी की विविधताओं से उपजा आकर्षण
मंदिरों में आयोजित सांझी मनोरथ के अंतर्गत प्रभु सेवा क्रम में क्रमश: फूलों से बनी सांझी, रंग सांझी तथा पानी के ऊपर और नीचे सांझी के अंकन आकर्षण का केंद्र होते हैं। रंग सांझी तैयार करने के दौरान सूखे रंगों को, छोटे सूती कपड़े की पोटरियों द्वारा उंगलियों के संचालन से रंग छानते हुए कलात्मक बेल बूटे तैयार करते हैं तो दृश्य देखने लायक होता है। इसी तरह यह कला पानी के ऊपर तथा नीचे और अधिक आकर्षण उत्पन्न करती है। इसी क्रम में फूलों से बननी वाली कलात्मक साँझियाँ भी मानव मन को सहज ही विमोहित करतीं हैं। साँझी सेवा के दौरान आरम्भ में पुष्प साँझी ही प्रभु को निवेदित की जाती है।
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राधारानी गोपियों के संग बनातीं थी सांझी
प्रसंग के अनुसार जब श्रीकृष्ण गौचारण कर लौटते तो गोधूलि बेला में राधारानी गोपिकाओं के साथ मार्ग को विभिन्न प्रकार के पुष्पों से सजा देतीं थीं। जिसे देख श्रीकृष्ण तथा ग्वाल मण्डली आनंदित होती थीं।आज भी मंदिरों में इस परम्परा का अनुकरण होता है।
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गायन में सांझी परंपरा
केवल कलागत सौन्दर्य ही नहीं इस परम्परा से जुड़ीं पदावलियों का गायन इसके महत्त्व को और अधिक बढाता है। राधाबल्लभ सम्प्रदाय के आचार्य श्रीहित सुकृतलाल गोस्वामी बताते हैं कि उपासना परम्परा के अनुसार साँझी में लीलाओं का अंकन होता है,वहीं समाज गायन के अन्तर्गत सांयकाल विभिन्न वाणीकारों द्वारा रचित पदावलियाँ गायीं जाती हैं।
लिखित परंपरा से दर्शित सांझी का गौरव
वृंदावन शोध संस्थान के शोध एवं प्रकाशन अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा बताते हैं कि सांझी मात्र कला के रूप में अभिव्यक्त परंपरा नहीं अपितु इससे जुडे़ लेखन और गायन के समृद्ध धरातल से इसका गौरव जिस वृहदता से दिखता है, वह अद्भुत है। डॉ. शर्मा बताते हैं इस समृद्ध परंपरा से जुड़े साहित्य का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी अप्रकाशित पांडुलिपियों के रुप में संस्थान संग्रह में विद्यमान है।
सुमित गोस्वामी राधारमण मंदिर के सेवायत बताते हैं कि सांझी की कला ब्रज की सबसे प्राचीन कलाओं में से एक है। इसे राधे का प्रतिरूप मानकर शाम के समय इसकी आरती होती है। पितृ पक्ष में यह उत्सव मनाया जाता है,लेकिन इसबार आम लोगों को इसके दर्शन नहीं हो सकेंगे।