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2 करोड़ रुपये में छह विदेशी कर पाए बैलून की सैर
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 07 Dec 2016 12:11 AM IST
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अफसरों का सैर सपाटा बनकर रह गया बैलून फेस्टिवल,
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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2 करोड़ रुपये प्रदेश सरकार के खर्च हो गए, लेकिन ताज बैलून फेस्टिवल में केवल छह विदेशी पर्यटक ही बैलून में उड़ान भर पाए। 25 से 30 नवंबर तक ताजनगरी के पीएसी मैदान में चले बैलून फेस्टिवल में कुल 200 लोग ही उड़ान भर पाए थे। हर दिन पांच विदेशी पर्यटकों और 10 लोकल लोगों का कोटा तय किया गया था, लेकिन छह दिनों के फे स्टिवल में कोटे की संख्या 30 के उलट केवल छह विदेशी पर्यटकों को ही मौका दिया गया। उनका हक छीनकर अफसरों को बैलून की सैर करने दी गई।
लगातार दूसरी साल हुए ताज बैलून फेस्टिवल को यूं तो पर्यटन प्रोत्साहन के नाम पर आयोजित किया गया, लेकिन किया एकदम उलट। बैलून फेस्टिवल में न तो पर्यटक बुलाए गए और न ही पर्यटन संस्थाएं। पर्यटकों को बैलून फेस्टिवल की जानकारी देने और लाने वाले टूर आपरेटर, गाइड, ट्रेवल एजेंट तक को फेस्टिवल से दूर रखा गया ताकि अफसरों और उनके परिवारों को सैर का मौका दिया जा सके। यूपी टूरिज्म के लखनऊ में बैठे अधिकारियों ने शहर के किसी भी पर्यटन संगठन के सदस्य, गाइड को बैलून की सैर नहीं करने दी। बीते साल बर्ड फेस्टिवल से जुड़े एक पर्यटन संगठन को जरूर आखिरी वक्त में न्यौता भेजा गया था, लेकिन इस साल तो यह पर्यटन संगठन भी दरकिनार कर दिया गया। टूर आपरेटरों के मुताबिक उन्हें बैलून फेस्टिवल में आमंत्रित ही नहीं किया गया। बिन बुलाए जाने पर बेइज्जती से बेहतर है कि उन्होंने पीएसी मैदान का रुख ही नहीं किया। उन्हें ताज महोत्सव में सैलानियों के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार का डर भी सताता रहा।
उद्घाटन के दिन भी न उड़े विदेशी
बैलून फेस्टिवल के पहले दिन लखनऊ से लेकर आगरा तक के आला अफसरों ने बैलून की उड़ान भरी, लेकिन उन्हें इतना याद नहीं रहा कि फेस्टिवल जिन विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए हो रहा है, वही विदेशी सैलानी बैलून की उड़ान में नहीं आए। दूसरे, तीसरे और चौथे दिन दो-दो विदेशी सैलानी बैलून में बैठे, लेकिन आखिरी दिनों में कोहरे के कारण उड़ान ही नहीं हो पाई। इस तरह केवल तीन दिन में 6 विदेशी ही बैलून से सैर कर पाए। जो लोकल लोगों का कोटा तय किया गया, उसमें अफसरों के सिफारिशी और उनके परिवार के लोगों के नाम ही निकाले गए। केवल नाम के लिए ही लकी ड्रा रखा गया, जबकि कूपनों पर 95 फीसदी नाम अफसरों के सिफारिशी के भरे गए। जाहिर है लकी ड्रा में ऐसे में उनके ही नाम निकले।
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बैलून फेस्टिवल में पर्यटक और आपरेटर तो थे ही नहीं। जिस मकसद के साथ बैलून फेस्टिवल किया गया, उससे न तो पर्यटन का फायदा हुआ और न ही यह पर्यटकों तक पहुंचा।
राजीव सक्सेना, महासचिव, टूरिज्म गिल्ड
सरकार के खर्चों पर अफसरों को घुमाने का महोत्सव था बैलून फेस्टिवल। न ताज पर प्रचार, न किले पर, न होटल में, न किसी गाइड, आपरेटर को पता, फिर पर्यटक आते भी कैसे। अपनों की सैर के लिए ही शायद पर्यटकों तक प्रचार नहीं किया गया।
शमशुद्दीन, पूर्व अध्यक्ष, एप्रूव्ड गाइड एसोसिएशन
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लगातार दूसरी साल हुए ताज बैलून फेस्टिवल को यूं तो पर्यटन प्रोत्साहन के नाम पर आयोजित किया गया, लेकिन किया एकदम उलट। बैलून फेस्टिवल में न तो पर्यटक बुलाए गए और न ही पर्यटन संस्थाएं। पर्यटकों को बैलून फेस्टिवल की जानकारी देने और लाने वाले टूर आपरेटर, गाइड, ट्रेवल एजेंट तक को फेस्टिवल से दूर रखा गया ताकि अफसरों और उनके परिवारों को सैर का मौका दिया जा सके। यूपी टूरिज्म के लखनऊ में बैठे अधिकारियों ने शहर के किसी भी पर्यटन संगठन के सदस्य, गाइड को बैलून की सैर नहीं करने दी। बीते साल बर्ड फेस्टिवल से जुड़े एक पर्यटन संगठन को जरूर आखिरी वक्त में न्यौता भेजा गया था, लेकिन इस साल तो यह पर्यटन संगठन भी दरकिनार कर दिया गया। टूर आपरेटरों के मुताबिक उन्हें बैलून फेस्टिवल में आमंत्रित ही नहीं किया गया। बिन बुलाए जाने पर बेइज्जती से बेहतर है कि उन्होंने पीएसी मैदान का रुख ही नहीं किया। उन्हें ताज महोत्सव में सैलानियों के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार का डर भी सताता रहा।
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उद्घाटन के दिन भी न उड़े विदेशी
बैलून फेस्टिवल के पहले दिन लखनऊ से लेकर आगरा तक के आला अफसरों ने बैलून की उड़ान भरी, लेकिन उन्हें इतना याद नहीं रहा कि फेस्टिवल जिन विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए हो रहा है, वही विदेशी सैलानी बैलून की उड़ान में नहीं आए। दूसरे, तीसरे और चौथे दिन दो-दो विदेशी सैलानी बैलून में बैठे, लेकिन आखिरी दिनों में कोहरे के कारण उड़ान ही नहीं हो पाई। इस तरह केवल तीन दिन में 6 विदेशी ही बैलून से सैर कर पाए। जो लोकल लोगों का कोटा तय किया गया, उसमें अफसरों के सिफारिशी और उनके परिवार के लोगों के नाम ही निकाले गए। केवल नाम के लिए ही लकी ड्रा रखा गया, जबकि कूपनों पर 95 फीसदी नाम अफसरों के सिफारिशी के भरे गए। जाहिर है लकी ड्रा में ऐसे में उनके ही नाम निकले।
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बैलून फेस्टिवल में पर्यटक और आपरेटर तो थे ही नहीं। जिस मकसद के साथ बैलून फेस्टिवल किया गया, उससे न तो पर्यटन का फायदा हुआ और न ही यह पर्यटकों तक पहुंचा।
राजीव सक्सेना, महासचिव, टूरिज्म गिल्ड
सरकार के खर्चों पर अफसरों को घुमाने का महोत्सव था बैलून फेस्टिवल। न ताज पर प्रचार, न किले पर, न होटल में, न किसी गाइड, आपरेटर को पता, फिर पर्यटक आते भी कैसे। अपनों की सैर के लिए ही शायद पर्यटकों तक प्रचार नहीं किया गया।
शमशुद्दीन, पूर्व अध्यक्ष, एप्रूव्ड गाइड एसोसिएशन