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यूपी में क्यों घुट रहा दम?: हर साल बढ़ रहे दमा-सांस के 12 फीसदी मरीज, वजह जानने के लिए 75 जिलों में होगा शोध
Sun, 21 Jun 2026 03:49 PM IST
Arun Parashar
धर्मेंद्र त्यागी, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
धर्मेंद्र त्यागी, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Arun Parashar
Updated Sun, 21 Jun 2026 03:49 PM IST
सार
उत्तर प्रदेश क्लीन एयर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट के तहत 75 जिलों में शोध होगा। इसके लिए विश्व बैंक से शासन के साथ समझौता हुआ है। लैब के लिए 27.9 लाख रुपये और मिनी सुपर साइट के लिए 5.20 करोड़ रुपये मिलेंगे। हर जिले में शोध की जिम्मेदारी अलग-अगल संस्थाओं को दी गई है।
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सड़क पर उड़ता धूल का गुबार।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
हवा में कार्बन, भारी तत्व, पीएम 2.5 तत्व तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे हर साल दमा-सांस रोग के 10 से 12 फीसदी मरीज बढ़ रहे हैं। इससे असमय मौत भी हो रही है। इसकी वजह-दुष्प्रभाव जानने के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने उत्तर प्रदेश क्लीन एयर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट शुरू किया है। इसमें 15 संस्थानों को 75 जिलों में शोध की जिम्मेदारी दी गई है। विश्व बैंक इसका खर्च वहन करेगा।
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय को आगरा, मथुरा और इटावा, सेंटर फॉर द डेवलपमेंट ऑफ ग्लास इंडस्ट्री को फिरोजाबाद और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अलीगढ़, एटा, हाथरस और कासगंज मिला है। इनमें लैब बनेगी और पर्यावरण संबंधी नए पाठ्यक्रम भी शुरू होंगे। इनके लिए आईआईटी कानपुर पाठ्यक्रम तय करेगा। प्रोजेक्ट में चार मिनी सुपर साइट (आगरा, अलीगढ़, गोरखपुर, झांसी) बनेंगी। विश्व बैंक से शासन के साथ समझौता हुआ है। लैब के लिए 27.9 लाख रुपये और मिनी सुपर साइट के लिए 5.20 करोड़ रुपये मिलेंगे।
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डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय को आगरा, मथुरा और इटावा, सेंटर फॉर द डेवलपमेंट ऑफ ग्लास इंडस्ट्री को फिरोजाबाद और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अलीगढ़, एटा, हाथरस और कासगंज मिला है। इनमें लैब बनेगी और पर्यावरण संबंधी नए पाठ्यक्रम भी शुरू होंगे। इनके लिए आईआईटी कानपुर पाठ्यक्रम तय करेगा। प्रोजेक्ट में चार मिनी सुपर साइट (आगरा, अलीगढ़, गोरखपुर, झांसी) बनेंगी। विश्व बैंक से शासन के साथ समझौता हुआ है। लैब के लिए 27.9 लाख रुपये और मिनी सुपर साइट के लिए 5.20 करोड़ रुपये मिलेंगे।
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पांच साल में 525 से अधिक नमूनों पर होगा शोध
विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लाइफ साइंस के निदेशक और प्रोजेक्ट के नोडल अधिकारी प्रो. भूपेंद्र स्वरूप शर्मा ने बताया कि विशेषज्ञ प्रदूषित क्षेत्र चिह्नित कर उपकरण लगाएंगे। हर साल न्यूनतम 104 नमूने लेकर लैब में कार्बन, पीएम 2.5 समेत अन्य की जांच करेंगे। 525 से अधिक नमूनों की लैब में जांच करने के बाद वजह, दुष्प्रभाव और बचाव की रिपोर्ट शासन को भेजेंगे। इसके आधार पर शासन गाइडलाइन बनाएगा। प्रोजेक्ट की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लाइफ साइंस के निदेशक और प्रोजेक्ट के नोडल अधिकारी प्रो. भूपेंद्र स्वरूप शर्मा ने बताया कि विशेषज्ञ प्रदूषित क्षेत्र चिह्नित कर उपकरण लगाएंगे। हर साल न्यूनतम 104 नमूने लेकर लैब में कार्बन, पीएम 2.5 समेत अन्य की जांच करेंगे। 525 से अधिक नमूनों की लैब में जांच करने के बाद वजह, दुष्प्रभाव और बचाव की रिपोर्ट शासन को भेजेंगे। इसके आधार पर शासन गाइडलाइन बनाएगा। प्रोजेक्ट की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
युवा भी हो रहे पीड़ित
एसएन मेडिकल कॉलेज में वक्ष एवं क्षय रोग विभाग के डॉ. गजेंद्र विक्रम सिंह ने बताया कि प्रदूषण की वजह से हवा में कार्बन, आर्सेनिक, लेड, सल्फर डाई ऑक्साइड समेत कई तरह के हानिकारक गैस और तत्व मिल रहे हैं। इससे दमा, सांस रोग और टीबी की बीमारी बढ़ रही है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से फेफड़े का कैंसर भी बढ़ रहा है। युवाओं में यह तेजी से बढ़ रही है। हर महीने ओपीडी में औसतन 7500 मरीज आ रहे हैं। प्रदूषण से हर साल 10 से 12 फीसदी मरीज बढ़ रहे हैं।
एसएन मेडिकल कॉलेज में वक्ष एवं क्षय रोग विभाग के डॉ. गजेंद्र विक्रम सिंह ने बताया कि प्रदूषण की वजह से हवा में कार्बन, आर्सेनिक, लेड, सल्फर डाई ऑक्साइड समेत कई तरह के हानिकारक गैस और तत्व मिल रहे हैं। इससे दमा, सांस रोग और टीबी की बीमारी बढ़ रही है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से फेफड़े का कैंसर भी बढ़ रहा है। युवाओं में यह तेजी से बढ़ रही है। हर महीने ओपीडी में औसतन 7500 मरीज आ रहे हैं। प्रदूषण से हर साल 10 से 12 फीसदी मरीज बढ़ रहे हैं।
प्रदेश में ये करेंगे शोध
आगरा- डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय
फिरोजाबाद- सेंटर फॉर द डेवलपमेंट ऑफ ग्लास इंडस्ट्री
अलीगढ़- अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
बरेली- महात्मा ज्योतिबा फुले रोहिलखंड यूनिवर्सिटी
बिजनौर- राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज
गोरखपुर- मदनमोहन मालवीय यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी
दिल्ली- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी
रुड़की- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी
झांसी- बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी
कानपुर- हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी
लखनऊ- उत्तर प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल डिपार्टमेंट
आंबेडकर नगर- राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज
मेरठ- चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी
प्रयागराज- मोतीलाल नेहरू नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी
वाराणसी- इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट विभाग हिंदू यूनिवर्सिटी
आगरा- डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय
फिरोजाबाद- सेंटर फॉर द डेवलपमेंट ऑफ ग्लास इंडस्ट्री
अलीगढ़- अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
बरेली- महात्मा ज्योतिबा फुले रोहिलखंड यूनिवर्सिटी
बिजनौर- राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज
गोरखपुर- मदनमोहन मालवीय यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी
दिल्ली- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी
रुड़की- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी
झांसी- बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी
कानपुर- हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी
लखनऊ- उत्तर प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल डिपार्टमेंट
आंबेडकर नगर- राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज
मेरठ- चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी
प्रयागराज- मोतीलाल नेहरू नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी
वाराणसी- इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट विभाग हिंदू यूनिवर्सिटी
आगरा में 486 तक पहुंच चुका है एक्यूआई
आगरा में प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। बीते पांच वर्षों की बात करें तो अधिकतम एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 486 तक पहुंच चुका है। आमतौर पर इसे 50 रहना चाहिए। 51 से 100 तक इसे संतोषजनक माना जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार 9 नवंबर, 2021 में 486 एक्यूआई था। आवासीय क्षेत्र में 120 और औद्योगिक क्षेत्र का 200 एक्यूआई रहता है।
ये भी पढ़ें-'अब मैं कभी नहीं लाैटूंगी': एक ही दुपट्टे से बंधे हाथ, नहर में मिली जीजा-सलहज की लाशें; इसलिए दी दोनों ने जान
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