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अपना अपना दर्द: उजड़े ख़्वाबों को लेकर मां निकल पड़ी...

Wed, 20 May 2020 10:44 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Wed, 20 May 2020 10:44 PM IST
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poetry on mothers in lockdown
सूटकेस पर लेटा मासूम - फोटो : अमर उजाला
कोरोना संकट के बीच लॉकडाउन में प्रवासी मजदूर परिवार के साथ पलायन करने को मजबूर हैं। कोई पैदल घर लौट रहा है तो कोई साइकिल से। उन्हीं के साथ किसी मां ने अपने कलेजे के टुकड़े को सूटकेस पर लिटाकर पैदल सफर तय किया तो कोई अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ सैकड़ों किमी पैदल चली। सोशल मीडिया पर लोग इन मजदूरों की तस्वीरें साझा कर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर रहे हैं। 
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भोपाल निवासी सिविल इंजीनियर प्रमोद तिवारी ने मजदूर से मजबूर बनी मांओं की पीड़ा को कविता से बयां किया। प्रमोद तिवारी का कहना है कि लॉकडाउन में सड़क पर पैदल चल रहीं मांओं की मुश्किलों को देखकर मन व्यथित हो जाता है। उस मां की मनोदशा को ध्यान में रखते हुए कुछ प्रयास किया है । वैसे तो उसकी परेशानी को शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। पर फिर भी एक प्रयास है।
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पढ़िए मां को समर्पित यह कविता

poetry on mothers in lockdown
प्रमोद तिवारी ने मां पर लिखी यह कविता - फोटो : अमर उजाला
उजड़े ख़्वाबों को लेकर मां निकल पड़ी।
गर्भ में बच्चे को लेकर मां निकल पड़ी ।
महीनों की चिन्ता छोड़ मां निकल पड़ी ।
दर्द की शाल ओढ़ विवश मां निकल पड़ी ।
भूखी-प्यासी दर्द को सहती मां निकल पड़ी।
पैरों में छाले सर पर पोटली लिए मां निकल पड़ी ।
भूखा बच्चा गर्भ से भी तो पूछता होगा ।
माँ ओ मेरी माँ तू कैसे मुझे सींच रही है ।
कैसे मुझको अपनी ममता में भींच रही है।
कदम दर कदम तू भूखी कैसे चलती  है ।
खुद साँसों को थाम सांस मुझको देती है।
क्या माँ दुनिया इतनी ही निष्ठुर होती है ।
क्या यही गरीबी  है जिसको तू रोती है।
मत रो मां मेरी प्यारी मां तू मत रो ।
नहीं तुझे मैं तंग करूंगा ,
भूख थोड़ी मैं भी सह लूंगा ।
तेरे हर कदमों पर उठते 
दर्द को मैं भी सह लूंगा ।
सांस रखूंगा माँ जन्म लेने तक ।
फिर इस निष्ठुर जग से लूंगा जवाब 
तेरे हर दर्द का , 
तेरे कदमों के छालों का ।
तेरी भूख का , तेरी प्यास का ।
गरीबी में उजड़े तेरे हर ख़्वाब का ।
मां ओ मेरी प्यारी मां दुनिया पर नहीं 
मुझ पर भरोसा रखना ।
 
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