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पितृपक्ष: मुगलों-अंग्रेजों ने भी तीर्थनगरी में किए थे श्राद्धकर्म, पोथियों में दर्ज हैं साक्ष्य
Fri, 11 Sep 2020 01:06 PM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कासगंज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कासगंज
Published by: Abhishek Saxena
Updated Fri, 11 Sep 2020 01:06 PM IST
सार
संवत 1200 ( सन 1257) तक के साक्ष्यों की पोथियां अभी भी पुरोहितों के पास हैं। इनमें स्पष्ट है कि ईरान, अफगानिस्तान, सऊदी अरब के अलावा लंदन, नेपाल, वर्मा के लोगों ने भी पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां तर्पण किया था।
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हरिपदी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
तीर्थनगरी में तर्पण का महत्व सदियों पुराना है। पुरोहितों की पोथियों में दर्ज मुगलों और अंग्रेजों के तर्पण के साक्ष्य भी यह बयां कर रहे हैं। संवत 1200 ( सन 1257) तक के साक्ष्यों की पोथियां अभी भी पुरोहितों के पास हैं। इनमें स्पष्ट है कि ईरान, अफगानिस्तान, सऊदी अरब के अलावा लंदन, नेपाल, वर्मा के लोगों ने भी पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां तर्पण किया था।
क्या कहते हैं पुरोहित और शोधकर्ता
हिंदू धर्म की पूजा पद्धति से प्रभावित होकर वर्ष 1976 में लंदन से विलियम टेरेंस, वर्ष 1996 पेरिस से मैरिस होलोन भारत के हिंदू तीर्थों का भ्रमण करते हुए सोरों आए थे।
यहां उन्होंने हिंदू पद्धति से विधि-विधानपूर्वक पूजा अर्चना की और श्राद्ध पूजा कर पुरोहितों से पूर्वजों के लिए तर्पण कराया। आज भी उनका हस्तलिखित ब्योरा पोथियों में दर्ज है। - शिवांशु दुबे, संयोजक, सलोने समर्पित सेवा संस्थान।
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क्या कहते हैं पुरोहित और शोधकर्ता
हिंदू धर्म की पूजा पद्धति से प्रभावित होकर वर्ष 1976 में लंदन से विलियम टेरेंस, वर्ष 1996 पेरिस से मैरिस होलोन भारत के हिंदू तीर्थों का भ्रमण करते हुए सोरों आए थे।
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यहां उन्होंने हिंदू पद्धति से विधि-विधानपूर्वक पूजा अर्चना की और श्राद्ध पूजा कर पुरोहितों से पूर्वजों के लिए तर्पण कराया। आज भी उनका हस्तलिखित ब्योरा पोथियों में दर्ज है। - शिवांशु दुबे, संयोजक, सलोने समर्पित सेवा संस्थान।
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राधेश्याम काका,डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित
- फोटो : अमर उजाला
हमारे यहां 800 से अधिक वर्ष पुरानी बहियों के लेख और साक्ष्य मौजूद हैं। इनमें स्पष्ट है कि मुगलों ने तीर्थनगरी आकर श्राद्ध पूजा और तर्पण किया था। संवत 1208 में टोंक के नवाब सहूद उल्लाह जो बाद में ईरान चले गए।
उन्होंने बाद में ईरान से आकर पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पूजा की। संवत 1286 में अरब से जोजा उलकरीम, संवत 1950 में बगदाद से अजमउल्लाह, संवत 1349 में तुर्की अरब से आतिम शाहिद, संवत 1871 में पाकिस्तान से शेरअफजत उल्लाह भी यहां आए थे। - राधेश्याम काका, तीर्थपपुरोहित।
सोरों तीर्थनगरी सृष्टि के आरंभ की तीर्थनगरी है। गंगा संहिता व वराह पुराण में वर्णन के अनुसार यहां भगवान श्रीराम के निवास, स्नान और उनके द्वारा किए गए पिंडदान का उल्लेख मिलता है।
काम्पिल्य नरेश, द्रुपद, पांडव, बलराम, महाप्रभु बल्लभाचार्य, गुरुनानक देव आदि के आने की अंतहीन श्रंखला का उल्लेख है। राजा सोमदत्त सोलंकी ने संवत 1940 में सोरों को अपनी राजधानी बनाकर राज किया था। बाद में अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध पूजा कर राज्य की सारी भूमि ब्राह्मणों को दान कर वन में तपस्या को चले गए थे। - डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित, सोरों सामग्री शोधकर्ता।
उन्होंने बाद में ईरान से आकर पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पूजा की। संवत 1286 में अरब से जोजा उलकरीम, संवत 1950 में बगदाद से अजमउल्लाह, संवत 1349 में तुर्की अरब से आतिम शाहिद, संवत 1871 में पाकिस्तान से शेरअफजत उल्लाह भी यहां आए थे। - राधेश्याम काका, तीर्थपपुरोहित।
सोरों तीर्थनगरी सृष्टि के आरंभ की तीर्थनगरी है। गंगा संहिता व वराह पुराण में वर्णन के अनुसार यहां भगवान श्रीराम के निवास, स्नान और उनके द्वारा किए गए पिंडदान का उल्लेख मिलता है।
काम्पिल्य नरेश, द्रुपद, पांडव, बलराम, महाप्रभु बल्लभाचार्य, गुरुनानक देव आदि के आने की अंतहीन श्रंखला का उल्लेख है। राजा सोमदत्त सोलंकी ने संवत 1940 में सोरों को अपनी राजधानी बनाकर राज किया था। बाद में अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध पूजा कर राज्य की सारी भूमि ब्राह्मणों को दान कर वन में तपस्या को चले गए थे। - डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित, सोरों सामग्री शोधकर्ता।
पंडित आशीष दुबे, शिवांशु दुबे
- फोटो : अमर उजाला
जब अंग्रेजों का भारत पर राज था तब बहुत से ब्रिटिश नागरिक तीर्थनगरी आए थे। लेफ्टिनेट एलकेपी चार्ली 1833 में आए थे। लखनऊ के नवाबों ने भी यहां गंगास्नान कर हिंदू रिति रिवाज से श्राद्धकर्म किया था। जिनके ब्यौरे भी हमारे पोथियों में दर्ज हैं। सोरों में अंग्रेजों और मुगलों ने श्राद्धकर्म किए थे। - पंडित आशीष दुबे, तीर्थपुरोहित।