तीर्थनगरी सोरों में पितरों के तर्पण को उमड़े श्रद्धालु, पुरोहितों ने कराए श्राद्ध कर्म
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श्राद्ध पक्ष के दूसरे दिन प्रतिपदा तिथि में तर्पण के लिए बुधवार को तीर्थनगरी सोरों में श्रद्धालु पहुंचे। गंगा स्नान कर पितरों को तर्पण किया। पुरोहितों ने विधि विधानपूर्वक श्राद्ध पूजा कराई। उसके बाद श्रद्धालुओं ने मंदिरों में पहुंच दर्शन किए और परिवार की सुख शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।
राजस्थान, मध्यप्रदेश सहित प्रदेश के कई इलाकों से श्रद्धालुओं की भीड़ तीर्थनगरी सोरों में उमड़ी। बड़ी संख्या में श्रद्धालु पितरों के तर्पण को पहुंचे। यहां सबसे पहले हरिपदी के घाट पर गंगा स्नान किया और फिर पितरों को याद किया। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में श्रद्धालुओं ने स्नान कर पहले तो पूजा अर्चना की, उसके बाद मध्यकाल में पिंडदान, जल तर्पण आदि श्राद्ध कर्म किए।
पुरोहितों द्वारा वराह घाट, लक्ष्मण घाट, बालाजी घाट लक्ष्मण घाट बालाजी घाट, भागीरथी गंगा मंदिर घाट, लाल घाट पर विधि विधानपूर्वक श्राद्ध के कर्मकांड किए गए। श्रद्धालुओं ने पितरों को तर्पण कर ब्राह्मणों को भोज कराया और दान पुण्य किया।
उमड़ी भीड़ तो सक्रिय हुई पुलिस
श्राद्ध कर्म और गंगास्नान के लिए तीर्थनगरी के हरिपदी घाट पर भीड़ उमड़ी। सुबह पश्चिम घाट पर जब आस पास के लोगों की भीड़ अधिक हो गई तो पुलिस को सक्रियता दिखानी पड़ी। पुलिस ने लोगों को चेतावनी देते हुए भीड़ को हटाया और कोरोना गाइडलाइन का पालन करने के निर्देश दिए।
उतारी मां गंगा की आरती, चढ़ाया प्रसाद
भाद्रपद पूर्णिमा के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने लहरा, सोरों और कछला में गंगास्नान कर पुण्य लाभ कमाया। श्रद्धालुओं ने हर हर गंगे के जयकारे लगाते हुए ब्रह्म मुहूर्त से ही गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाई। मां गंगा की आरती उतारी और प्रसाद चढ़ाया।
गंगास्नान के बाद सोरों हरिपदी घाट पर श्रद्धालुओं ने परिक्रमा लगाई। वराह मंदिर, बालाजी दरबार, गणपति, रघुनाथ जी, सिद्ध हनुमान, द्वारिकाधीश, सोमेश्वर, पंचमहाशक्ति, बटुकनाथ, शनिदेव मंदिर में श्रद्धालु देवदर्शन को उमड़े।
सूकरक्षेत्र में तर्पण से होता है पितृदोष का निवारण
पंडित राहुल वशिष्ठ ने बताया कि पितरों के उद्देश्य विधि-विधान पूर्वक को कर्म श्रद्धा के साथ किया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध में कुछ बातें अत्यंत महत्व की हैं। जैसे कुतप बेला दिन का आठवां मुहूर्त श्राद्ध के लिए मुख्य रूप से प्रशस्त है। आठवें मुहूर्त को ही कुतप बेला कहते हैं। सोरों में श्राद्ध कर्म करने से पितृदोष का निवारण होता है।