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अब टीबी के मरीजों को हर रोज मिलेगी दवा, बस इन बातों का रखें ख्याल
ब्यूरो/अमर उजाला आगरा
Updated Tue, 31 Oct 2017 12:59 PM IST
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टीबी मरीजों के लिए राहत भरी खबर है, उन्हें एक मुश्त सात गोलियां नहीं खानी होंगी। अब मरीजों को हर रोज दवा दी जाएगी। गोलियों की संख्या वजन के मुताबिक तय की जाएगी। इसे एफडीसी (फिक्स डोज कॉम्बीनेशन) नाम दिया गया है। राष्ट्रीय क्षय नियंत्रण कार्यक्रम के तहत 30 अक्तूबर से एसएन मेडिकल कालेज और स्वास्थ्य विभाग में नई विधि से उपचार शुरू हो गया है।
अभी तक टीबी मरीज को सप्ताह में सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को दवा खानी होती थी। एक रैपर में सात गोलियां होती थी, जिसे मरीज को एक ही दिन में खाना होता था। गोलियों की संख्या अधिक होने पर कई मरीज इसमें आधी-अधूरी दवाएं खाते थे।
इससे उनके मल्टी ड्रग रजिस्टेंट के मामले बढ़ रहे थे। अब एक गोली में चार दवाओं का मिश्रण होगा, जिससे मरीज को इलाज की तय डोज मिल जाएगी। जिला क्षय रोग अधिकारी डा. आरके अग्निहोत्री ने बताया कि एफडीसी से टीबी मरीजों के इलाज में आसानी होगी। कम गोलियां होने पर मरीज को परेशानी भी कम होगी। डाट्स केंद्रों पर 30 अक्तूबर से नई विधि से इलाज शुरू हो गया है।
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अभी तक टीबी मरीज को सप्ताह में सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को दवा खानी होती थी। एक रैपर में सात गोलियां होती थी, जिसे मरीज को एक ही दिन में खाना होता था। गोलियों की संख्या अधिक होने पर कई मरीज इसमें आधी-अधूरी दवाएं खाते थे।
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इससे उनके मल्टी ड्रग रजिस्टेंट के मामले बढ़ रहे थे। अब एक गोली में चार दवाओं का मिश्रण होगा, जिससे मरीज को इलाज की तय डोज मिल जाएगी। जिला क्षय रोग अधिकारी डा. आरके अग्निहोत्री ने बताया कि एफडीसी से टीबी मरीजों के इलाज में आसानी होगी। कम गोलियां होने पर मरीज को परेशानी भी कम होगी। डाट्स केंद्रों पर 30 अक्तूबर से नई विधि से इलाज शुरू हो गया है।
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बलगम की जांच नकारात्मक आने पर एक्सरे जरूरी
मरीज की जांच के बाद चिकित्सक बल्गम की जांच कराता है और रिपोर्ट नकारात्मक रहती है तो ऐसे में चिकित्सक उस मरीज का एक्सरे भी कराएगा। इलाज की नई विधि में ऐसे मामलों में एक्सरे को जरूरी बताया है। एसएन मेडिकल कालेज के चिकित्सक डा. जीवी सिंह बताते हैं कि रिपोर्ट नकारात्मक आने के बाद कई बार एक्सरे से संक्रमण पता चल जाता है।
67 फीसदी मरीज छोड़ देते हैं बीच में इलाज
टीबी मरीजों का दो चरणों में इलाज होता है। पहले चरण में छह महीने का कोर्स चलता है, इसमें नए मरीज रहते हैं। दूसरे चरण में दवा का कोर्स आठ महीने का है, इसमें बीच में इलाज छोड़ने वाले, आधी-अधूरी दवा लेने वाले या फिर गंभीर मरीज रहते हैं। हैरत की बात यह है कि 33 फीसदी मरीज ही पूरा कोर्स कराते हैं, जबकि 67 फीसदी मरीज पूरा इलाज नहीं कराते।
6056: मरीज पंजीकृत हैं टीबी के
650: डाट्स सेंटर हैं आगरा में
03: दिन सप्ताह में खानी होती दवा
6056: मरीज पंजीकृत हैं टीबी के
650: डाट्स सेंटर हैं आगरा में
03: दिन सप्ताह में खानी होती दवा