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राम को किसी भाषा में न बांटकर संपूर्णता में देखने की जरूरत

Wed, 27 Oct 2021 02:03 AM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Wed, 27 Oct 2021 02:03 AM IST
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'Need to see Ram in its entirety, not in any language'
आगरा। दयालबाग शिक्षण संस्थान (डीईआई) के अंतरराष्ट्रीय सभागार में मंगलवार को हिंदुस्तानी एकेडमी के सहयोग से ‘ब्रजभाषा साहित्य में लोकरक्षक राम’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई। समापन सत्र की अध्यक्ष साहित्यकार पद्मश्री प्रो. उषा यादव ने कहा कि राम को किसी भाषा में न बांटकर संपूर्णता में देखने की जरूरत है। उन्होंने राम को संस्कारों का एक समूह कहा जो आभिजात्य से पृथक है। राम विशिष्ट होते हुए भी सामान्य हैं।
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राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष ने कहा कि यदि लक्ष्य एक हो तो विभिन्न जातियों, संस्कृतियों, प्रजातियों के जीव भी एकत्र रहते हैं। रामायण इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा कि वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस में कहीं सबरी प्रसंग का उल्लेेख नहीं है। यह प्रसंग सर्वप्रथम ब्रजभाषा के महाकवि सूरदास ने लिखा। केंद्रीय हिंदी संस्थान के डॉ. अनुपम श्रीवास्तव ने कहा कि ब्रज क्षेत्र न सिर्फ कृष्ण लीला बल्कि रामलीला के लिए भी विख्यात है। आगरा कॉलेज की डॉ. शेफाली चतुर्वेदी, वक्ता राज बहादुर, वक्ता डॉ. जितेंद्र कुमार सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संचालन डीईआई की डॉ. सोना दीक्षित ने किया।
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मुख्य अतिथि एडीए उपाध्यक्ष डॉॅ. राजेंद्र पैंसिया ने कहा कि व्यक्ति अपने ज्ञान का 80 फीसदी गर्भ में सीख लेता है और बाकी उम्र भर सीखते रहता है। सुधार बीज में होता है, पेड़ में महज काट-छांट होती है। उन्होंने कहा कि अभिभावक, शिशु को नहीं बल्कि शिशु गर्भ को चुनता है। दिव्य शिशु या पुत्र, प्रार्थना करने वालों को ही होता है। समापन सत्र का संचालन डीईआई के डॉ. प्रेमशंकर ने किया। विशिष्ट अतिथि संस्थान की कोषाध्यक्ष डॉ. स्नेह बिजलानी, संयोजिका डॉ. रंजना पांडेय रहीं। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. ब्रजराज सिंह ने किया।
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