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राष्ट्रीय हैंडलूम दिवस: फ्रांस और जर्मनी में घरों की शोभा बढ़ रही फतेहपुर सीकरी की दरी
Sat, 07 Aug 2021 11:31 AM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Sat, 07 Aug 2021 11:31 AM IST
सार
फतेहपुर सीकरी में हौजरी की कतरन से दरी तैयार की जाती है। यह उद्योग अंग्रेजों के जमाने का है। एक दर्जन गांवों के घर-घर में दरी बनाने का काम होता है।
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दरी बनातीं महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
आगरा में आजादी से पहले शुरू हुआ फतेहपुर सीकरी का दरी उद्योग आज दस हजार बुनकर परिवारों की आजीविका चला रहा है। यहां हाथ से बनी दरियां जर्मनी, फ्रांस और यूरोप के अन्य देशों तक में घरों की शोभा बढ़ा रही हैं। शुरुआत में यहां सूत से दरियां और फर्श बनते थे। अब कपड़े और हौजरी की कतरन से दरी तैयार होती है। पुश्तों से लोग इस व्यवसाय से जुड़े हैं।
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शहर से करीब 35 किमी दूर फतेहपुर सीकरी कस्बे के सीकरी दो हिस्सा, सौनोटी, नगला जन्नू, जहानपुर, मई बुजुर्ग, जौताना सहित 12 से अधिक गांवों के घर-घर में दरी बनाई जाती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पत्थरों के खनन पर लगी रोक के बाद लोग इस पेशे से और जुड़े है। हालांकि अधिकांश परिवारों में यह पेशा आजादी के पहले से चला आ रहा है। पिछले करीब 30 वर्षों के दौरान यह उद्योग फतेहपुर सीकरी की पहचान बन गया है। हौजरी के वेस्ट से यह दरियां तैयार होती हैं। सभी काम हाथों से ही किया जाता है।
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यूरोपीय देशों में होती है सप्लाई
हाथ से बनीं इन दरियों की सर्वाधिक मांग यूरोपीय देशों में है। करीब 90 फीसदी उत्पादन का निर्यात होता है। मुख्य रूप से यह दरियां जर्मनी, इटली और फ्रांस भेजी जाती हैं। कोरोना काल में कुछ कम ऑर्डर मिले लेकिन अब काम फिर से पटरी पर लौट रहा है। वाराणसी, प्रयागराज, पानीपत, भदोही से स्थानीय फैक्टरी संचालकों को ऑर्डर मिलते हैं।
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बुनकरों का दर्द: पैसा कम मिलता है
बुनकरों की शिकायत है कि उनका मेहनताना कम है। चिंदी और धागे से दिन भर दरी तैयार करने पर वे 150-200 रुपये ही कमा पाते हैं। इन बुनकरों को 30 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से भुगतान मिलता है।
वाजिब पैसा नहीं मिलता
बुनकर नईम ने कहा कि दिन भर काम करने के बाद 150-200 रुपये ही मिल पाते हैं। मेहनत के आधार पर वाजिब पैसा मिलना चाहिए।
मुश्किल सके चलता है घर
बुनकर रुखसाना ने बताया कि बरसों से इस काम में लगे हैं। जितनी मेहनत है, उतना मेहनताना नहीं मिल पाता है। मुश्किल से घर को चला पाते हैं।
बुनकरों की शिकायत है कि उनका मेहनताना कम है। चिंदी और धागे से दिन भर दरी तैयार करने पर वे 150-200 रुपये ही कमा पाते हैं। इन बुनकरों को 30 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से भुगतान मिलता है।
वाजिब पैसा नहीं मिलता
बुनकर नईम ने कहा कि दिन भर काम करने के बाद 150-200 रुपये ही मिल पाते हैं। मेहनत के आधार पर वाजिब पैसा मिलना चाहिए।
मुश्किल सके चलता है घर
बुनकर रुखसाना ने बताया कि बरसों से इस काम में लगे हैं। जितनी मेहनत है, उतना मेहनताना नहीं मिल पाता है। मुश्किल से घर को चला पाते हैं।
थीम पार्क में जगह आरक्षित
लघु उद्योग राज्यमंत्री चौधरी उदयभान सिंह ने कहा कि प्रस्तावित थीम पार्क में फतेहपुर सीकरी के दरी उद्योग के लिए जगह आरक्षित है। बुनकरों तक सरकारी सुविधाएं पहुंचाने के लिए सरकार कटिबद्ध है। एक जिला-एक उत्पाद की तर्ज पर काम किया जा रहा है।
लघु उद्योग का मिला दर्जा
वर्ष 2016 में आगरा, बरेली, अलीगढ़, इटावा और मिर्जापुर के दरी उद्योग को सरकार ने लघु उद्योगों की सूची में शामिल किया। 80 करोड़ रुपये से अधिक का सालाना कारोबार है। कोरोना काल से पहले 100 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार था।
लघु उद्योग राज्यमंत्री चौधरी उदयभान सिंह ने कहा कि प्रस्तावित थीम पार्क में फतेहपुर सीकरी के दरी उद्योग के लिए जगह आरक्षित है। बुनकरों तक सरकारी सुविधाएं पहुंचाने के लिए सरकार कटिबद्ध है। एक जिला-एक उत्पाद की तर्ज पर काम किया जा रहा है।
लघु उद्योग का मिला दर्जा
वर्ष 2016 में आगरा, बरेली, अलीगढ़, इटावा और मिर्जापुर के दरी उद्योग को सरकार ने लघु उद्योगों की सूची में शामिल किया। 80 करोड़ रुपये से अधिक का सालाना कारोबार है। कोरोना काल से पहले 100 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार था।