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‘धाम’ को प्रदूषण से ‘मोक्ष’ के लिए अनुष्ठान

Sat, 19 Dec 2015 01:51 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला आगरा
ब्यूरो, अमर उजाला आगरा Updated Sat, 19 Dec 2015 01:51 AM IST
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mokshdham
ताजगंज स्थित श्मशान ‘मोक्षधाम’ की वजह से ताजमहल पर बढ़ते प्रदूषण का हल ढूंढ लिया गया है। मुंबई-दिल्ली, गाजियाबाद आदि के बाद यहां भी ‘मोक्षदा हरित शवदाह प्रणाली’ लगाने की तैयारी है। सर्वे कार्य पूरा हो चुका है। जल्द ही प्रशासन और प्रणाली लगाने वाली समिति के बीच करार भी होना है।
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बता दें, नजदीक स्थित होने कारण श्मशान से उठने वाले धएं के कारण ताजमहल के पीला पड़ने की आशंका जताई जाती रही है। इसीलिए इसे स्थानांतरित करने की कोशिश तक हुई हालांकि जनविरोध के कारण ऐसा न हो सका। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे हटाने की जगह विद्युत शवदाह गृह को बढ़ावा देने को कहा। ताकि शवदाह में लकड़ी का कम घटे। ऐसे में प्रशासन ने गाजियाबाद की मोक्षदा पर्यावरण एवं वन सुरक्षा समिति की मदद से मोक्षधाम को हाईटेक करने की राह निकाली। एक शव के दाह में लगने वाली (सर्वे के मुताबिक) लगभग 400 किग्रा की जगह मोक्षदा ग्रीन क्रेमेशन सिस्टम (एमजीसीएस) में मात्र 100 किग्रा लकड़ी की जरूरत होगी। कार्बन उत्सर्जन भी घटेगा। यह सिस्टम लगाने के लिए सर्वे कराया जा चुका है। अब प्रशासन और समिति के बीच समझौता होना है। इसके बाद डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनेगी। उम्मीद है कि अगले साल की शुरुआत में ही मोक्षधाम में सिस्टम कार्य कर सकता है। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट के जज कूरियन जोसेफ ने देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू को पत्र लिखकर श्मशान घाट के कारण ताजमहल को खतरा बताया था।  
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पहले चरण में चार यूनिट
सर्वे के बाद समिति ने प्राथमिक रिपोर्ट प्रशासन को सौंप दी है। इसमें पहले चरण में चार यूनिट लगाने का सुझाव दिया गया है। एक यूनिट की लागत करीब 43 लाख रुपये होगी।
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कवर्ड होता है सिस्टम
इस सिस्टम में शव दाह के लिए तीन तरफ से कवर्ड प्लेटफॉर्म तैयार किया जाता है। इसके ऊपर बनी ऊंची चिमनी में लगे उपकरण कार्बन कणों को रोक देते हैं। सिर्फ गैस बाहर निकलती है।  

नदी का संरक्षण भी
दाह संस्कार की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राख आदि को अन्य पदार्थों के साथ मिलकर खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। यानी यमुना नदी में बहाने से रोका जा सकता है।

 

वर्जन
हमने जिला प्रशासन को प्रजेंटेशन दे दिया है। एमओयू साइन हो जाएगा। डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। इस सिस्टम के लगने से बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए दाह संस्कार पूरी परंपरा के साथ हो सकेंगे।
- अंशुल गर्ग, मोक्षदा समिति
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