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मथुरा: त्रिदिवसीय सांझी उत्सव व कार्यशाला शुरू
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गोदा बिहार मंदिर में सांझी का निर्माण करते कलाकार।
- फोटो : VRINDAVAN
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वृंदावन (मथुरा)। ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के तत्वावधान में श्री गोदा विहार मंदिर में त्रिदिवसीय सांझी उत्सव एवं कार्यशाला शुरू हो गई।
संस्थान के सचिव लक्ष्मीनारायण तिवारी ने बताया कि ब्रज के मंदिरों में सांझी बनाने का वर्णन मध्यकाल से ही प्राप्त होता है। सांझी शब्द की उत्पत्ति संध्या (सांझ) शब्द से मानी जाती है। रसिक साधकों ने सांझी को फूलों, सूखे रंगों, भूमि एवं पानी पर बनाया। कला शिल्पियों ने अपनी कला का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए भगवान श्रीराधाकृष्ण की अनेक लीलाओं को सांझी में उकेरा।
आज भी ब्रज के अनेक मंदिर में पितृ पक्ष में सांझी महोत्सव मनाया जाता है। प्रकाशन अधिकारी गोपाल शरण शर्मा ने कहा कि ब्रज के देवालयों की रंग सांझी में मिट्टी की एक अठ पहलू वेदी पर बेलों की जटिल ज्यामिति आकृतियों का निर्माण किया जाता है, जिनमें खाकों के माध्यम से सूखे रंगों का संयोजन किया जाता है। इस के केंद्र में होता है श्रीराधाकृष्ण के लीला प्रसंगों का चित्रण। इससे पूर्व सांझी कलाकार विश्वजीत दास, ब्रजगोपाल चित्रकार, मदनमोहन शर्मा ने प्रतिभागियों को सांझी का प्रशिक्षण दिया। मानव मेहरा, राखी मेहरा, वर्षा आचार्य, मोहन थे।
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संस्थान के सचिव लक्ष्मीनारायण तिवारी ने बताया कि ब्रज के मंदिरों में सांझी बनाने का वर्णन मध्यकाल से ही प्राप्त होता है। सांझी शब्द की उत्पत्ति संध्या (सांझ) शब्द से मानी जाती है। रसिक साधकों ने सांझी को फूलों, सूखे रंगों, भूमि एवं पानी पर बनाया। कला शिल्पियों ने अपनी कला का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए भगवान श्रीराधाकृष्ण की अनेक लीलाओं को सांझी में उकेरा।
आज भी ब्रज के अनेक मंदिर में पितृ पक्ष में सांझी महोत्सव मनाया जाता है। प्रकाशन अधिकारी गोपाल शरण शर्मा ने कहा कि ब्रज के देवालयों की रंग सांझी में मिट्टी की एक अठ पहलू वेदी पर बेलों की जटिल ज्यामिति आकृतियों का निर्माण किया जाता है, जिनमें खाकों के माध्यम से सूखे रंगों का संयोजन किया जाता है। इस के केंद्र में होता है श्रीराधाकृष्ण के लीला प्रसंगों का चित्रण। इससे पूर्व सांझी कलाकार विश्वजीत दास, ब्रजगोपाल चित्रकार, मदनमोहन शर्मा ने प्रतिभागियों को सांझी का प्रशिक्षण दिया। मानव मेहरा, राखी मेहरा, वर्षा आचार्य, मोहन थे।
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