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शर्मनाक: इस स्मार्ट सिटी में आज भी ढोया जा रहा 'मैला'
नीरज शर्मा/अमर उजाला आगरा
Updated Wed, 09 Aug 2017 05:57 PM IST
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खुले में शौच
- फोटो : अमर उजाला
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बड़ा शर्मनाक है लेकिन इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है, कि जो शहर स्मार्ट सिटी घोषित हो गया हो वहां आज भी मैला ढोने की कुप्रथा चल रही है। प्रदेश और केंद्र सरकार के स्वच्छ भारत मिशन और खुले में शौच से मुक्त करने के अभियान को शहर के बीचोंबीच बसा एक मोहल्ला मुंह चिढ़ा रहा है। यही गंदगी यमुना में जा रही है।
शहर के लोहामंडी इलाके में सैय्यद पाड़ा मोहल्ला है। यहां की आबादी करीब 20-30 हजार है। अधिकांश मुस्लिम आबादी है। मोहल्ले में न तो सीवर लाइन है और ना ही सेप्टिक टैंक। हालात यह हैं कि 60-65 फीसदी घरों में गंदगी नालियों में जाती है और नगर निगम के कर्मचारियों को उन नालियों की सफाई करनी पड़ती है।
नगर निगम के अधिकारी दावा करते हैं कि क्षेत्र में करीब 225 सार्वजनिक शौचालय हैं ओडीएफ अभियान के तहत लगभग 30 हजार आवेदन आए थे, इनमें से करीब 15 हजार आवेदनों में से लगभग 8000 घरों में निर्माण के लिए धनराशि जारी कर दी गई है। उधर सैय्यद पाड़ा क्षेत्र के लोगों का कहना है कि यहां न तो कोई कभी सर्वे करने आया और न ही किसी ने योजना के बारे में जानकारी दी।
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शहर के लोहामंडी इलाके में सैय्यद पाड़ा मोहल्ला है। यहां की आबादी करीब 20-30 हजार है। अधिकांश मुस्लिम आबादी है। मोहल्ले में न तो सीवर लाइन है और ना ही सेप्टिक टैंक। हालात यह हैं कि 60-65 फीसदी घरों में गंदगी नालियों में जाती है और नगर निगम के कर्मचारियों को उन नालियों की सफाई करनी पड़ती है।
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नगर निगम के अधिकारी दावा करते हैं कि क्षेत्र में करीब 225 सार्वजनिक शौचालय हैं ओडीएफ अभियान के तहत लगभग 30 हजार आवेदन आए थे, इनमें से करीब 15 हजार आवेदनों में से लगभग 8000 घरों में निर्माण के लिए धनराशि जारी कर दी गई है। उधर सैय्यद पाड़ा क्षेत्र के लोगों का कहना है कि यहां न तो कोई कभी सर्वे करने आया और न ही किसी ने योजना के बारे में जानकारी दी।
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ये हैं आंकड़े
खुले में शौच
- फोटो : अमर उजाला
शहर की आबादी- 20,00000
निगम की सीमा में हैं वार्ड- 90
शहर में सामुदायिक शौचालय - 220
निजी आवेदन आए- 30,000
लाभार्थियों का हुआ चयन- 15,000
पात्रों को किया भुगतान- 8,000
शुष्क शौचालय- 15-20 फीसदी इलाके में
निगम की सीमा में हैं वार्ड- 90
शहर में सामुदायिक शौचालय - 220
निजी आवेदन आए- 30,000
लाभार्थियों का हुआ चयन- 15,000
पात्रों को किया भुगतान- 8,000
शुष्क शौचालय- 15-20 फीसदी इलाके में
नालियों में बहाई जा रही गंदगी
खुले में शौच
- फोटो : अमर उजाला
क्षेत्रीय पार्षद राजपाल यादव कहते हैं कि पिछले पांच वर्षों में मैंने क्षेत्र के लिए बहुत काम किए, यहां पानी की समस्या को दूर करा दिया लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद सीवर समस्या का समाधान अधिकारियों ने नहीं किया। इसी वजह से अभी भी यहां नान फ्लश शौचालय हैं।
क्षेत्रीय निवासी शानू कुरैशी ने बताया कि यहां के करीब 60 फीसदी घरों में सेप्टिक टैंक बनाने को स्थान नहीं है और सीवर लाइन यहां है नहीं। इसकी वजह से गंदगी नालियों में बहाई जाती है।
क्षेत्रीय निवासी शानू कुरैशी ने बताया कि यहां के करीब 60 फीसदी घरों में सेप्टिक टैंक बनाने को स्थान नहीं है और सीवर लाइन यहां है नहीं। इसकी वजह से गंदगी नालियों में बहाई जाती है।
निगम ने दिया है झूठा शपथ पत्र
नगर निगम के सफाई कर्मचारी श्याम कुमार करुणेश का कहना है कि नगर निगम के अधिकारी जनता को ही नही, भारत सरकार को भी धोखा दे रहे हैं। भारत सरकार ने सर्वे कराया था कि शहर में मैला ढोने की कुप्रथा तो नहीं चल रही।
इस पर निगम के अधिकारियों ने झूठा शपथ दाखिल किया है कि 100 प्रतिशत जल प्रवाहित शौचालय हैं लेकिन हकीकत यह है कि शहर के सैयद पाड़ा, ढोलीखार, मंटोला जैसे इलाकों में हाथ से मैला साफ करना पड़ता है।
इस पर निगम के अधिकारियों ने झूठा शपथ दाखिल किया है कि 100 प्रतिशत जल प्रवाहित शौचालय हैं लेकिन हकीकत यह है कि शहर के सैयद पाड़ा, ढोलीखार, मंटोला जैसे इलाकों में हाथ से मैला साफ करना पड़ता है।
अधिकारी बोले लांग टर्म प्रोसेस
पर्यावरण अभियंता संजीव प्रधान का कहना है कि इसको मैला ढोने की प्रथा तो नहीं कहेंगे लेकिन शहर में अभी कुछ इलाके ऐसे हैं जहां न तो सेप्टिक टैंक हैं और न ही वहां सीवर लाइन की व्यवस्था है। इस मामले को भी अमृत योजना के तहत टेकअप किया जा रहा है, लेकिन पूरे शहर को सीवर लाइन से कनेक्ट करना एक लांग टर्म प्रोसेस है।