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स्वतंत्रता संग्राम में अमर बलिदानी बने महावीर सिंह राठौर

Sat, 14 Aug 2021 11:10 PM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Sat, 14 Aug 2021 11:10 PM IST
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Mahavir Singh Rathore became an immortal sacrificer in the freedom struggle
कासगंज। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में जिले के पटियाली तहसील क्षेत्र के गांव शाहपुर टहला में जन्मे शहीद महावीर सिंह राठौर का नाम सम्मान के साथ याद किया जाता है। बालपन से ही कुछ कर गुजरने की इच्छा ने उन्हें महान बलिदानी बना दिया। शहीद भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव के साथ उन्होंने क्रांति की पटकथा में कई अध्याय जोड़े। दिल्ली असेंबली में बम फेंकने एवं अंग्रेज अफसर सांडर्स के हत्या में भी शामिल रहे।
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महावीर सिंह किशोर उम्र से ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने लगे। हमउम्र बच्चों की टोलियां बनाकर अमन सभा आयोजित कर ब्रिटिश अफसरों के सामने अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में नारे लगाए और महात्मा गांधी के समर्थन में नारेबाजी की। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें विद्रोही घोषित कर दिया। इससे महावीर सिंह के मन में धधकी आजादी की ज्वाला और भड़क उठी। इंटरमीडिएट की शिक्षा के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए कानपुर डीएवी कॉलेज में पहुंचे। जहां चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में आए और उनकी सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन के सदस्य बन गए। यहीं उनका परिचय भगत सिंह से हुआ।
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1929 में दिल्ली की असेंबली में बम फेंका गया और अंग्रेज अफसर सांडर्स की हत्या की गई। इन दोनों ही मामलों में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त एवं महावीर सिंह को गिरफ्तार किया गया। मुकदमे की सुनवाई लाहौर में हुई। महावीर सिंह को भगत सिंह का सहयोग करने में आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी। उन्हें पंजाब व तमिलनाडु की जेलों में रखा गया। 1933 में उन्हें अंडमान की सेल्यूलर जेल भेज दिया गया। क्रांतिकारियों के साथ अंडमान की जेल में महावीर सिंह ने भूख हड़ताल की। अंग्रेजों ने भूख हड़ताल तुड़वाने के लिए उनके मुंह में जबरन दूध डाला जो उनके फेफड़ों में चला गया और उनकी मौत हो गई। अंग्रेजों ने उनका शव पत्थरों से बांधकर समुद्र में प्रवाहित कर दिया। 1904 में जन्मे महावीर सिंह 29 वर्ष की अल्पायु में ही दुनिया से विदा ले गए।
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कई जगह लगी हैं प्रतिमाएं
अमर बलिदानी महावीर सिंह राठौर की स्मृति में देश के कई हिस्सों में उनकी प्रतिमाएं लगी हुई हैं। गांव शाहपुर टहला और पटियाली में तो उनकी प्रतिमा स्थापित है ही अंडमान की सेल्यूलर जेल में भी प्रतिमा स्थापित है। स्वतंत्रता आंदोलन के जानकार अमित तिवारी ने बताया कि शहीद के वशंज राजस्थान में रहते हैं।
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