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मां तुझे प्रणाम: कवि सम्मेलन-मुशायरा बाकी निशां.. में गूंजी कश्मीर की बात
Wed, 14 Aug 2019 11:21 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Wed, 14 Aug 2019 11:21 AM IST
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मां तुझे प्रणाम कार्यक्रम में हुए कवि सम्मेलन में मौजूद कवि
- फोटो : अमर उजाला
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मौका भी था और दस्तूर भी। स्वतंत्रता दिवस से ऐन पहले सूरसदन में मंगलवार रात जब कवि सम्मेलन और मुशायरे की महफिल सजी तो जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए हटाने पर वीर रस और हास्य रस, दोनों के ही कवियों ने श्रोताओं के जज्बातों को शब्दों में ढाल दिया।
जब-जब कश्मीर का जिक्र छिड़ता तो सूरसदन तालियों से गूंज उठता। अमर उजाला के अभिनव अभियान ‘मां तुझे प्रणाम’ के तहत कवि सम्मेलन एवं मुशायरे में मंगलवार रात देशभक्ति से ओतप्रोत रचनाओं के केंद्र में कश्मीर और सौहार्द की बात रही।
सूरसदन प्रेक्षागृह में मंगलवार रात कवि सम्मेलन एवं मुशायरा बाकी निशां... का उद्घाटन डा. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अरविंद कुमार दीक्षित ने किया।
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मां सरस्वती की वंदना के बाद कवि सम्मेलन और मुशायरे का आगाज हुआ। शायर डा. कलीम कैसर, खुर्शीद हैदर, कवि मदन मोहन समर, अजय अंजाम, अनिल अग्रवंशी, पवन आगरी और अंकिता सिंह की रचनाओं पर श्रोता वाह-वाह करते रहे।
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जब-जब कश्मीर का जिक्र छिड़ता तो सूरसदन तालियों से गूंज उठता। अमर उजाला के अभिनव अभियान ‘मां तुझे प्रणाम’ के तहत कवि सम्मेलन एवं मुशायरे में मंगलवार रात देशभक्ति से ओतप्रोत रचनाओं के केंद्र में कश्मीर और सौहार्द की बात रही।
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सूरसदन प्रेक्षागृह में मंगलवार रात कवि सम्मेलन एवं मुशायरा बाकी निशां... का उद्घाटन डा. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अरविंद कुमार दीक्षित ने किया।
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मां सरस्वती की वंदना के बाद कवि सम्मेलन और मुशायरे का आगाज हुआ। शायर डा. कलीम कैसर, खुर्शीद हैदर, कवि मदन मोहन समर, अजय अंजाम, अनिल अग्रवंशी, पवन आगरी और अंकिता सिंह की रचनाओं पर श्रोता वाह-वाह करते रहे।
कवियों के इन लाइनों पर बजी तालियां
‘दफा तीन सौ सत्तर पैंतीस ए के दाग धुले हैं, लालचौक व लालकिला अब हिलमिल गले मिले हैं। अठखेली को उछला नीला-नीली डल का पानी, केसर घुली हवाएं बोलीं जय बाबा बर्फानी’ मदन मोहन समर (कवि भोपाल)
जंग नहीं जीती जाती है इन जज्बाती नारों से, ये इतिहास लिखा जाता है खून सनी तलवारों से बाहर के दुश्मन से तो हम जंग जीत लें जब चाहे, हम तो बाजी हार रहे हैं भीतर के गद्दारों से अजय अंजाम (औरैया)
कोशिश ये ज़ियादा से, न कुछ कम से हुई है, तामीर वतन मैं से नहीं, हम से हुई है हर हाल में नस्लों को भुगतना ही पड़ेगा, इक ऐसी खता साहिबे आलम से हुई है। डॉ. कलीम कैसर (गोरखपुर)
‘दफा तीन सौ सत्तर पैंतीस ए के दाग धुले हैं, लालचौक व लालकिला अब हिलमिल गले मिले हैं। अठखेली को उछला नीला-नीली डल का पानी, केसर घुली हवाएं बोलीं जय बाबा बर्फानी’ मदन मोहन समर (कवि भोपाल)
जंग नहीं जीती जाती है इन जज्बाती नारों से, ये इतिहास लिखा जाता है खून सनी तलवारों से बाहर के दुश्मन से तो हम जंग जीत लें जब चाहे, हम तो बाजी हार रहे हैं भीतर के गद्दारों से अजय अंजाम (औरैया)
कोशिश ये ज़ियादा से, न कुछ कम से हुई है, तामीर वतन मैं से नहीं, हम से हुई है हर हाल में नस्लों को भुगतना ही पड़ेगा, इक ऐसी खता साहिबे आलम से हुई है। डॉ. कलीम कैसर (गोरखपुर)
गैर परों पर उड़ सकते हैं हद से हद दीवारों तक, अम्बर पर तो वही उड़ेंगे, जिनके अपने पर होंगे। खुर्शीद हैदर (मुजफ्फरनगर) हंसना-हंसाना तो आदत है मेरी, अपना बनाना तो आदत है मेरी, लोग तो मुंह फेर के चल देते है, आवाज दे बुलाना आदत है मेरी अनिल अग्रवंशी (कवि, दिल्ली)
वो जिसपर उसकी रहमत हो वो दौलत मांगता है क्या? मुहब्बत करने वाला दिल मुहब्बत मांगता है क्या ? तुम्हारा दिल कहे जब भी उजाला बन के आ जाना, कभी उगता हुआ सूरज इजाजत मांगता है क्या! अंकिता सिंह (कवि, दिल्ली)
केसर की घाटी में अब खुशहाली छा गई, आवारा कुत्तों को गुजराती बिल्ली खा गई इधर हम प्रियंका में इंदिरा को ढूंढते रहे, उधर शाह में पटेल की आत्मा आ गई। पवन आगरी (हास्य कवि एवं व्यंग्यकार)
वो जिसपर उसकी रहमत हो वो दौलत मांगता है क्या? मुहब्बत करने वाला दिल मुहब्बत मांगता है क्या ? तुम्हारा दिल कहे जब भी उजाला बन के आ जाना, कभी उगता हुआ सूरज इजाजत मांगता है क्या! अंकिता सिंह (कवि, दिल्ली)
केसर की घाटी में अब खुशहाली छा गई, आवारा कुत्तों को गुजराती बिल्ली खा गई इधर हम प्रियंका में इंदिरा को ढूंढते रहे, उधर शाह में पटेल की आत्मा आ गई। पवन आगरी (हास्य कवि एवं व्यंग्यकार)