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UP: माैत के सामान में आराम का सफर...स्लीपर बसें में क्यों है खतरा, पड़ताल में सामने आया सच
Wed, 17 Dec 2025 12:03 PM IST
धीरेन्द्र सिंह
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Wed, 17 Dec 2025 12:03 PM IST
सार
मथुरा में यमुना एक्सप्रेस-वे पर हुए हादसे में जिन बसों में आग लगी, वो स्लीपर कोच थे। अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या इन बसों में सफर करना सुरक्षित है या नहीं। देखें ग्राउंड रिपोर्ट...
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स्लीपर बस
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
बसों में आग लगने की अधिकतर घटनाएं स्लीपर एसी बसों में हो रही हैं। आराम का सफर माैत के सामान में हो रहा है। हादसा होने पर लोगों को बचने का कम ही मौका मिल पा रहा है। इसकी वजह कोई और नहीं, बल्कि अत्याधुनिक बस बन रही हैं। इनमें कमजोर वायरिंग, अतिरिक्त सीट, अत्यधिक फोम और लकड़ी के इंटीरियर से हादसे का मंजर भयावह हो रहा है। इतना ही नहीं अप्रशिक्षित चालक-परिचालक लोगों की जान बचाने के बजाय भाग जाते हैं।
आग लगने का कारण
आगरा कालेज में रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डाॅ. अमित अग्रवाल ने बताया कि अधिकतर वाहन डीजल और सीएनजी के होते हैं। पेट्रोल के मुकाबले डीजल में आग धीमी गति से फैलती है जबकि सीएनजी में आग तेजी से लगती है। डीजल फैलने पर अगर वाहन के अन्य उपकरण, फोम तक पहुंच जाता है तो आग ज्यादा भड़कती है। बसों के इंटीरियर में जो सामान लगाया जाता है, वह कम गुणवत्ता का होता है। नए तारों की जगह पुराने तारों का प्रयोग किया जाता है। शार्ट सर्किट होने पर तारों में आग फैल जाती है। एसी की सर्विस पर भी ध्यान नहीं दिया जाता है।
छोटी आपातकालीन खिड़की
आरटीओ के मुताबिक, बस में चार दरवाजे होने चाहिए। इसमें एक चढ़ने और उतरने वाला मुख्य दरवाजा। दूसरा चालक के उतरने के लिए बना होता है। तीसरी आपातकालीन खिड़की सबसे पीछे की सीट पर बनी होती है। इसकी लंबाई और चाैड़ाई भी दो-दो फीट तक होती है। वहीं चाैथी खिड़की साइड में बनाई जाती है। आपातकालीन खिड़की की ऊंचाई भी अधिक होती है। ऐसे में यात्रियों का कूदना आसान नहीं होता है। खिड़की पर शीशा लगा दिया जाता है। इसे यात्री खोल नहीं पाते हैं।
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उतरने और चढ़ने के लिए एक ही दरवाजा
बसों में यात्रियों के उतरने और चढ़ने के लिए एक ही दरवाजा होता है, जो चालक के केबिन से निकलता है। बस के सामने से टकराने पर यही दरवाजा बंद हो जाता है। चालक की खिड़की से भी लोग नहीं निकल पाते हैं। ऐसे में स्लीपर बस में अंदर वाले हिस्से में यात्री फंस जाते हैं। स्लीपर बसों में नीचे की जगह ऊपर वाली सीट पर खतरा ज्यादा है। यहां से उतरना कठिन होता हे। हादसा होने पर यात्री केबिन में ही फंसे रह जाते हैं।
नशा, नींद और थकान हो रही खतरनाक
प्रो. अमित अग्रवाल बताते हैं कि बसों की डिजाइन ठीक नहीं है। इंटीरियर में फोम और लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। चालक और परिचालक चेकिंग न होने की वजह से नशे में वाहन दाैड़ाते हैं। उन्हें यातायात नियमों की जानकारी नहीं होती है। गंतव्य पर जल्दी पहुंचने के लिए चालक रास्ते में थकान और नींद आने पर आराम भी नहीं करते हैं।
एनाउंसमेंट और इमरजेंसी खिड़की से बचाव
रिटायर्ड सीओ बीएस त्यागी ने बताया कि कोहरे में दृश्यता शून्य हो जाती है। हादसे से बचने के लिए घना कोहरा होने पर वाहन सुरक्षित स्थान पर खड़ा कर दें। फॉग लाइट लगवाएं और सफेद पट्टी को गहरा किया जाए। टोल प्लाजा पर एनाउंसमेंट कर बसों के इमरजेंसी गेट के बारे में बताया जाए। लोगों को जानकारी होगी तो वो आसानी से निकल जाएंगे।
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आग लगने का कारण
आगरा कालेज में रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डाॅ. अमित अग्रवाल ने बताया कि अधिकतर वाहन डीजल और सीएनजी के होते हैं। पेट्रोल के मुकाबले डीजल में आग धीमी गति से फैलती है जबकि सीएनजी में आग तेजी से लगती है। डीजल फैलने पर अगर वाहन के अन्य उपकरण, फोम तक पहुंच जाता है तो आग ज्यादा भड़कती है। बसों के इंटीरियर में जो सामान लगाया जाता है, वह कम गुणवत्ता का होता है। नए तारों की जगह पुराने तारों का प्रयोग किया जाता है। शार्ट सर्किट होने पर तारों में आग फैल जाती है। एसी की सर्विस पर भी ध्यान नहीं दिया जाता है।
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छोटी आपातकालीन खिड़की
आरटीओ के मुताबिक, बस में चार दरवाजे होने चाहिए। इसमें एक चढ़ने और उतरने वाला मुख्य दरवाजा। दूसरा चालक के उतरने के लिए बना होता है। तीसरी आपातकालीन खिड़की सबसे पीछे की सीट पर बनी होती है। इसकी लंबाई और चाैड़ाई भी दो-दो फीट तक होती है। वहीं चाैथी खिड़की साइड में बनाई जाती है। आपातकालीन खिड़की की ऊंचाई भी अधिक होती है। ऐसे में यात्रियों का कूदना आसान नहीं होता है। खिड़की पर शीशा लगा दिया जाता है। इसे यात्री खोल नहीं पाते हैं।
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उतरने और चढ़ने के लिए एक ही दरवाजा
बसों में यात्रियों के उतरने और चढ़ने के लिए एक ही दरवाजा होता है, जो चालक के केबिन से निकलता है। बस के सामने से टकराने पर यही दरवाजा बंद हो जाता है। चालक की खिड़की से भी लोग नहीं निकल पाते हैं। ऐसे में स्लीपर बस में अंदर वाले हिस्से में यात्री फंस जाते हैं। स्लीपर बसों में नीचे की जगह ऊपर वाली सीट पर खतरा ज्यादा है। यहां से उतरना कठिन होता हे। हादसा होने पर यात्री केबिन में ही फंसे रह जाते हैं।
नशा, नींद और थकान हो रही खतरनाक
प्रो. अमित अग्रवाल बताते हैं कि बसों की डिजाइन ठीक नहीं है। इंटीरियर में फोम और लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। चालक और परिचालक चेकिंग न होने की वजह से नशे में वाहन दाैड़ाते हैं। उन्हें यातायात नियमों की जानकारी नहीं होती है। गंतव्य पर जल्दी पहुंचने के लिए चालक रास्ते में थकान और नींद आने पर आराम भी नहीं करते हैं।
एनाउंसमेंट और इमरजेंसी खिड़की से बचाव
रिटायर्ड सीओ बीएस त्यागी ने बताया कि कोहरे में दृश्यता शून्य हो जाती है। हादसे से बचने के लिए घना कोहरा होने पर वाहन सुरक्षित स्थान पर खड़ा कर दें। फॉग लाइट लगवाएं और सफेद पट्टी को गहरा किया जाए। टोल प्लाजा पर एनाउंसमेंट कर बसों के इमरजेंसी गेट के बारे में बताया जाए। लोगों को जानकारी होगी तो वो आसानी से निकल जाएंगे।