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न्यू आगरा में आया तेंदुआ, पूरे शहर में मचा हल्ला

Tue, 26 Apr 2016 01:08 AM IST
अमर उजाला आगरा
अमर उजाला आगरा Updated Tue, 26 Apr 2016 01:08 AM IST
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leopards comes in new agra calony
तेंदुअा - फोटो : अमर उजाला ब्‍यूूराो
तेंदुआ जंगल का राजा न सही, पर कुछ कम भी नहीं। बिजली सी तेजी, तूफान सी रफ्तार और शिकार पर अचूक वार... जंगली जानवरों में तेंदुआ कई मायनों में बेहद खास है। लेकिन शहर की चकाचौंध में आकर ऐसा फंसा कि नौ घंटे तक बंद कोठी का कैदी बनकर रह गया। भूखा-प्यासा पूरे दिन घुटन से परेशान रहा। जंगल में उसका बड़ा खौफ रहता है लेकिन यहां डरने वाले बहुत कम थे। उसका हल्ला जरूर दूर तक मचा। सुबह 11:30 से लेकर रात 8:30 बजे तक न्यू आगरा ही नहीं, पूरे शहर में तेंदुआ.. तेंदुआ होता रहा। नौ घंटे के हल्ले के बाद उसे पकड़ लिया गया।
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अब उसे कीठम के भालू संरक्षण केंद्र में पिजरे में रखा गया है। जंगल छोड़कर शहर में क्या आया, आजादी ही छिन गई। न्यू आगरा के घनी आबादी वाले इलाके इंद्रपुरी स्थित सुरेश नगर सोमवार उसे सबसे पहले कोठी नंबर 10 बी के चौकीदार चन्द्रभान ने देखा। 4200 वर्ग गज में बनी यह कोठी नमक की मंडी निवासी सराफ हजारी लाल और बोदला निवासी विजय शिवहरे की है। चंद्रभान ने तेंदुए को देखते ही अपने परिचित अधिवक्ता खुर्शीद को फोन करके बुलाया।
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तेंदुए ने उन पर हमला बोलने की कोशिश की। उस समय वह कोठी के किचिन में टहल रहा था। खुर्शीद ने हिम्मत करके उसे किचिन में बंद कर दिया। इसके बाद तेंदुए का हल्ला मच गया। हजारों लोग पहुंच गए। दोपहर साढ़े तीन बजे पुलिस जब किचिन के टूटे दरवाजे पर लकड़ी का तख्त लगाने की कोशिश कर रही थी, तब तेंदुआ छलांग लाकर बाहर निकला और कोठी के कैंपस में दौड़ लगाकर वापस किचिन में आ गया। इस बीच पुलिस वालों की सांसे अटकी रहीं।
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वन विभाग को पुलिस ने सूचना दी। वन विभाग के अधिकारियों ने हाथ खड़े कर दिए। इसके बाद कीठम में बीअर रेस्क्यू सेंटर चलाने वाले वाइल्ड लाइफ एनजीओ एसओएस की टीम ने पहुंचकर देर शाम साढ़े छह बजे तेंदुए को 12 वर्ग फुट के कमरे में बंद कर दिया। इसके बाद इसे इसके बाद उसे ट्रेंकुलाइज (बेहोश) कर पकड़ने के लिए  ऑपरेशन शुरू किया गया। इसमें रात साढ़े आठ बजे कामयाबी मिली। इसके बाद तेंदुए को पकड़ लिया गया।

शर्मिला जीव है तेंदुआ, इंसान से बहुत डरता है
तेंदुआ... नाम सुनकर थोड़ा डर लगता है। लेकिन जैसे जैसे इस वन्य जीव के इंसानी बस्तियों में आने की घटनाएं बढ़ रही हैं, वैसे वैसे इसकी दहशत कम भी होती जा रही है। न्यू आगरा में लोग तेंदुए से डर नहीं रहे थे बल्कि इसके नजदीक जाने के लिए मचल रहे थे। पुलिस न होती, तो उन्हें रोकना मुश्किल था। इसके विपरीत तेंदुआ डरा हुआ था। कमरे से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। वन्य जीव विशेषज्ञों की मानें तो तेंदुआ स्वभाव में शर्मीला होता है। इंसान से बहुत डरता है।
बिल्ली की 36 प्रजातियों में ही तेंदुआ भी शामिल है। इसी प्रजाति का एक जीव चीता 1951 के बाद से भारत के जंगलों में देखा नहीं गया है। तेंदुआ शिकार बहुत तेजी से करता है। इसकी रफ्तार तेज है। इसके हमले से बच पाना इसके शिकार के लिए बहुत ही मुश्किल होता है। यह हिरन, सांभर, बारहसिंघा का शिकार करता है।
कुत्ते और बंदर भी इसके प्रिय भोजन हैं। अगर इनमें से कुछ न मिले तो भूख लगने पर चूहा, खरगोश, मेढक और कछुआ भी खा लेता है। रास्ते की पहचान के लिए तेंदुआ मूत्र छोड़ते हुए चलता है। जिस रास्ते से जाता है, उसी से वापस आता है।
पश्चिमी यूपी की बात करें तो तेंदुआ शिवालिक की पहाड़ियों में काफी संख्या में है। सहारनपुर की शिवालिक, मोहंड और शाकंभरी वन्य क्षेत्र में इनकी संख्या 80 से ज्यादा बताई जाती है। इसके अलावा बिजनौर के जंगलोंमें भी तेंदुआ है।
आगरा के वन्य क्षेत्र में कभी तेंदुआ पाए जाने की सूचना वन विभाग के पास नहीं है। आस पास के जिलों से कभी कभा आ जरूर जाता है। पिछले दिनों फतेहपुर सीकरी में दिखाई दिया था। मथुरा में भी तेंदुआ नजर आ चुका है।

वर्जन
तेंदुआ शर्मीला जीव है, आगरा के जंगलों में नहीं पाया जाता है, इसका शहर में आना आश्चर्यजनक है - राजेश शर्मा ( रेंजर, वन विभाग)

ये सर्कस के जानवर हैं,जंगल में नहीं रह पा रहे
कभी तेंदुआ तो कभी हाथी। जंगली जानवर बार बार शहर में क्यों आ रहे हैं? हाल के दिनों में सबसे ज्यादा तेंदुए ने इंसानी बस्ती में दस्तक दी है। सवाल है आखिर क्यों तेंदुए शहर की ओर आ रहे हैं। क्या जंगल में उनके शिकार नहीं रहे या फिर कुछ और वजह है। सर्कस पर 34 साल से अध्ययन कर रहे बल्केश्वर के ललित किशोर का दावा है कि ये तेंदुए सर्कस के हैं, जंगल में छोड़ तो दिए गए, लेकिन वहां रह नहीं पा रहे। उन्होंने न्यू आगरा में आए तेंदुए के व्यवहार के बारे में भी जानकारी की है। इसके आधार पर उनका कहना है कि यह भी जंगली नहीं लग रहा।
ललित किशोर का कहना है कि उनका सर्कस से बचपन से लगाव रहा है। वे दूर संचार विभाग से सेवानिवृत्त हैं लेकिन सर्कस पर अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि जब सरकार की सख्ती के चलते सर्कसों से शेर, तेंदुआ, हाथी जैसे जंगली जानवरों के करतब बंद किए गए, तभी से संकट शुरू हो गया। हालांकि कई जगह जंगल में रहने वाले बाघ भी शहरों में आए हैं, लेकिन उनमें और सर्कस में रहे जानवरों में फर्क है।
ललित किशोर बताते हैं कि सर्कस में रहे जानवर कम हमलावर होते हैं। उनका मूवमेंट भी कम होता है। कैद में बिताई गई जिंदगी का असर उनके जीवन से जाता नहीं है। वे आजाद होकर भी सर्कस के कैदी बने रहते हैं। इसलिए उन्हें जंगल में शिकार करने में भी परेशानी होती है। जैसे न्यू आगरा में आया तेंदुआ एक ही जगह पर रहा। उसने किसी पर न तो हमला किया और न ही इधर उधर भागा। वर्ल्ड लाइफ एनजीओ एसओएस के अधिकारी भी यह मानते हैं कि अगर कोई जानवर लंबे समय सर्कस में या कलंदरों के पास रहा हो, तो कैद में बिताई जिंदगी की यादें उसका पीछा लंबे समय तक नहीं छोड़ती है।
-- कीठम में नाचते रहते हैं आजाद भालू
 कीठम में बीअर रेस्क्यू सेंटर है। यहां 200 से ज्यादा भालू हैं। इनमें से 80 फीसदी कलंदरों से छुड़ाए गए हैं। कलंदर इनका नाच दिखाकर पैसे कमाते हैं। उनकी कैद से छूटने के बाद इन्हें रेस्क्यू सेंटर के जंगल में रखा गया है। लेकिन कैद में बिताई जिंदगी इनका पीछा नहीं छोड़ रही। यहां भालू आपको नाचते हुए नजर आएंगे। उनका मूवमेंट भी बहुत सीमित दायरे में होता है।


जान जोखिम में डालकर किया तेंदुए का दीदार
तेंदुआ आया... तेंदुआ आया... शुरू में यही हल्ला मचा। दहशत फैल गई। लेकिन जैसे ही पता चला कि वह कोठी में है, वैसे ही खौफ छूमंतर हो गया। अब लोगों को ऑपरेशन तेंदुआ में रोमांच नजर आने लगा। इसका मजा लेने के लिए कोठी के चारों ओर हजारों लोग आ गए। सब तेेंदुए का दीदार करना चाहते थे। जितने लोग सड़क पर थे , उससे ज्यादा छतों पर। आठ साल के बच्चे से लेकर सत्तर साल के बुजुर्ग तक। सबके सिर पर तेंदुआ का क्रेज चढ़ गया। इसी क्रेज में सैंकड़ों लोग कोठी के ठीक सामने बन रही चार मंजिला इमारत पर जा चढ़े। चौथी मंजिल पर लिंटर पड़ रहा था, बल्लियां खड़ी थी, सरिए निकले हुए थे, यहां खड़ा होना मतलब जान जोखिम में डालना था, लेकिन किसी को परवाह ही नहीं थी। हर कोई तेंदुए की एक झलक पा जाने के लिए बेताब था। आस पास की कालोनियों के लोग पहुंच गए। मेले सा नजारा हो गया। चार ठेल आईसक्रीम की लग गई। दो चाऊमीन की। कई लोगों ने तो फोन करके रिश्तेदार भी बुला लिए। दोपहर का खाना छोड़ दिया। बच्चे पढ़ाई भूल गए। कई तो ट्यूशन नहीं गए। स्कूल से आते ही खड़े हो गए छत पर और टकटकी लगा दी कठी नंबर दस बी पर। इसी में छुपा था तेंदुआ।

 
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