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श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी की जनजाति ईदु मिश्मी की भाषा का हिंदी संस्थान ने बनाया कोश
Sat, 25 Jul 2020 12:13 PM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Sat, 25 Jul 2020 12:13 PM IST
सार
- इस भाषा को बोलने वाले 80 फीसदी लोग अरुणाचल के दिवांग वैली व लोअर दिवांग वैली में रहते हैं
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हिंदी-ईदु मिश्मी अध्येता कोश
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
आगरा के केंद्रीय हिंदी संस्थान ने हिंदी-ईदु मिश्मी अध्येता कोश बनाया है। ईदु मिश्मी भाषा को इसी नाम की जनजाति के लोग बोलते हैं। ये लोग अरुणाचल में चीन और तिब्बत के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी भी इसी जनजाति से थीं। महाभारत काल से ही इस जनजाति का महत्व है।
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इस कोश को तैयार करने में हिंदी भाषा विशेषज्ञ प्रोफेसर ओकेन लेगो, डॉ. सभापति मिश्र, ईदु मिश्मी विशेषज्ञ डॉ. अनिल मिली, डॉ. तारून मेने, दारगा लोंबो, मुको देले, चमाली मिल्ली, चेबी मिहु, बिम्ता तायु ने सहयोग दिया है।
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ईदु मिश्मी जनजाति का ब्रज व द्वारिका से सीधा संबंध है
केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रोफेसर नंद किशोर पांडेय ने बताया कि हिंदी-ईदु मिश्मी अध्येता कोश इस महत्वपूर्ण जनजाति की भाषा के साथ संस्कृति का संरक्षण करेगा। इस जनजाति का महाभारत काल से सीधा संबंध ब्रज और द्वारिका से है। इस कोश का सांस्कृतिक, एतिहासिक और भाषिक महत्व है। निश्चित रूप से यह हिंदी भाषी क्षेत्र व अरुणांचल के लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।
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इस भाषा को बोलने वालों की संख्या कम
ईदु मिश्मी लघु समूह की भाषा है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार इस भाषा को बोलने वालों की संख्या महज 11, 000 हजार थी। ईदु मिश्मी का आरंभिक भाषा वैज्ञानिक उल्लेख 1837 में ब्राउन और 1845 में रौलेट नामक भाषाविदों के कार्य में मिलता है। ईदु मिश्मी की करीब 80 फीसदी आबादी दिवांग वैली और लोअर दिवांग वैली जिलों में रहती है।
कृष्ण ने काटा रुक्मी का बाल... तब से चली आ रही परंपरा
प्रोफेसर नंद किशोर पांडेय ने बताया कि जब भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी का हरण करके ले जा रहे थे तो उनके भाई रुक्मी ने उनका पीछा किया था। श्रीकृष्ण ने रुक्मी को मारने के लिए अस्त्र उठाया तो रुक्मिणी ने रोक दिया। बाद में श्रीकृष्ण ने रुक्मी का बाल काटकर छोड़ दिया। आज भी इस भी इस जनजाति के लोग सिर में आगे की तरफ से अपने बाल कटवाते हैं। पुरुषों के साथ महिलाएं भी बाल कटवाती हैं। इसलिए इनको चूली काटा जनजाति भी कहते हैं।
अरुणाचल में राजा थे रुक्मिणी के पिता
अरुणाचल के इसी क्षेत्र में रुक्मिणी के पिता राजा थे। राजधानी भीष्मक नगर थी। यहां मालिनी थान नाम का एक मंदिर है। इसके बारे में प्रचलित है। श्रीकृष्ण रुक्मिणी को ले जा रहे थे, रास्ते में शिवजी का मंदिर था, वहां रुके। रुक्मिणी को फूलों की माला बनाकर पहनाई। इस देखकर पार्वती जी खुश हुई और श्रीकृष्ण से कहा कि वह अच्छे मालिनी (माला बनाने वाले) भी हैं। तभी से इस स्थान का नाम मालिनी थान है।
कृष्ण ने काटा रुक्मी का बाल... तब से चली आ रही परंपरा
प्रोफेसर नंद किशोर पांडेय ने बताया कि जब भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी का हरण करके ले जा रहे थे तो उनके भाई रुक्मी ने उनका पीछा किया था। श्रीकृष्ण ने रुक्मी को मारने के लिए अस्त्र उठाया तो रुक्मिणी ने रोक दिया। बाद में श्रीकृष्ण ने रुक्मी का बाल काटकर छोड़ दिया। आज भी इस भी इस जनजाति के लोग सिर में आगे की तरफ से अपने बाल कटवाते हैं। पुरुषों के साथ महिलाएं भी बाल कटवाती हैं। इसलिए इनको चूली काटा जनजाति भी कहते हैं।
अरुणाचल में राजा थे रुक्मिणी के पिता
अरुणाचल के इसी क्षेत्र में रुक्मिणी के पिता राजा थे। राजधानी भीष्मक नगर थी। यहां मालिनी थान नाम का एक मंदिर है। इसके बारे में प्रचलित है। श्रीकृष्ण रुक्मिणी को ले जा रहे थे, रास्ते में शिवजी का मंदिर था, वहां रुके। रुक्मिणी को फूलों की माला बनाकर पहनाई। इस देखकर पार्वती जी खुश हुई और श्रीकृष्ण से कहा कि वह अच्छे मालिनी (माला बनाने वाले) भी हैं। तभी से इस स्थान का नाम मालिनी थान है।