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UP: बंजर हो गया हरित प्रदेश का मुद्दा... सियासी नफा-नुकसान के गणित ने परवान नहीं चढ़ने दिया

Sat, 30 Mar 2024 02:06 PM IST
शाहरुख खान अखिलेश कुमार, अमर उजाला, आगरा
अखिलेश कुमार, अमर उजाला, आगरा Published by: शाहरुख खान Updated Sat, 30 Mar 2024 02:06 PM IST
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issue of Green Pradesh has become barren mathematics of political profit and loss did not allow it to take off
चौधरी चरण सिंह(फाइल फोटो)
कभी यूपी की सियासत को गर्म करने वाला हरित प्रदेश का मुद्दा अब कहीं नहीं है। इस चुनाव तक सियासत की सूरत और सीरत दोनों बदल गई हैं। संसद पहुंचने के लिए नए-नए रास्ते अख्तियार किए जा रहे हैं। मुद्दों पर गठबंधन से लेकर जाति का गुणा भाग हावी है। इस फेर में हरित प्रदेश का मुद्दा बंजर हो गया है।
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कभी सियासत में इसे पश्चिम के विकास का इंजन करार दिया गया था। यह सब तब है जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश यानी     मांग वाले हरित प्रदेश ने चौधरी चरण सिंह, बनारसी दास गुप्ता, राम प्रकाश गुप्ता, कल्याण सिंह और मायावती जैसे मुख्यमंत्री दिए हैं।
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1953 में चौधरी चरण सिंह ने राज्य पुनर्गठन आयोग से पश्चिमी यूपी को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग की थी। 97 विधायकों ने इसका समर्थन किया था। मामला विकास और अवसरों की बयार का था सो जोर पकड़े रहा। 1978 में सोहनलाल ने विधानसभा में इसका प्रस्ताव रखा।
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90 के दशक में चौधरी अजित सिंह ने हरित प्रदेश के मुद्दे को गरमाया था। बाद में जयंत चौधरी ने भी कई मर्तबा यह मांग उठाई। सियासी पकड़ कमजोर पड़ी तो रालोद गठबंधन की राह आ गया। सपा को यह मुद्दा कभी रास नहीं आया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में जयंत को सपा के साथ हाथ मिलाना पड़ गया। अब वह भाजपा के साथ हैं।

...इसलिए उलझ गया मुद्दा
सियासी जानकारों के मुताबिक नफा-नुकसान के गणित ने इस मुद्दे को परवान नहीं चढ़ने दिया। इसमें मुस्लिम वोटर अहम रहे। 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रस्तावित हरित प्रदेश में मुस्लिम आबादी 35.21 फीसदी थी।
 

सपा मुस्लिमों को अपना वोट बैंक मानती रही है। बसपा इन्हें तोड़ कर अपने पाले में करने के लिए पहल करती रही। रालोद की इस बेल्ट में ठीक ठाक पकड़ रही। नया प्रदेश बन जाने से यहां सियासत चमकाने का मौका मिल जाता। इसमें रालोद कामयाब नहीं हो सका तो राह बदल ली।

 

एटा के वरिष्ठ अधिवक्ता आदेश कुमार सक्सेना का कहना है कि वक्त और जरूरत के साथ मुद्दे बदल गए हैं। अब लोगों का ध्यान सीएए, एनआरसी, ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामलों की ओर है।

हरित प्रदेश में थे प्रस्तावित ये मंडल : आगरा, मेरठ, मुरादाबाद, सहारनपुर, बरेली और अलीगढ़ संभाग। राजधानी मेरठ प्रस्तावित की गई थी।
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