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पुराने पन्नों से: आजीवन राष्ट्रपति बनना चाहती थीं इंदिरा गांधी, यकीन न हो तो पढ़े लें ये खबर
Mon, 27 May 2024 08:03 AM IST
अनुज कुमार
संजीव सिंह, अमर उजाला, आगरा
संजीव सिंह, अमर उजाला, आगरा
Published by: अनुज कुमार
Updated Mon, 27 May 2024 08:03 AM IST
सार
उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव को लेकर चुनाव प्रचार का अंतिम दौर चल रहा है। पुराने पन्नों से एक किस्सा निकल कर सामने आया है। इंदिरा गांधी देश में अमेरिका जैसी राष्ट्रपति पद्धति की सरकार स्थापित करना चाहती थीं।
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पुराने पन्नों से
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी आजीवन राष्ट्रपति बनना चाहती थीं। उन्हें पता था कि आपातकाल के दौरान हुईं ज्यादतियों की कीमत छठवीं लोकसभा के चुनाव में चुकानी पड़ सकती है। यही नहीं नई सरकार उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर देगी। इसलिए उन्होंने इस योजना पर गंभीरता से विचार किया। प्लान को परवान चढ़ाने के लिए इमरजेंसी का समय चुना। उन्होंने अपने भरोसेमंद पूर्व आईसीएस अधिकारी से गहन मंथन भी किया, लेकिन उनकी सलाह के बाद यह विचार छोड़ दिया।
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अमर उजाला में 5 मई, 1977 के अंक में प्रकाशित समाचार के अनुसार, इंदिरा गांधी देश में अमेरिका जैसी राष्ट्रपति पद्धति की सरकार स्थापित करना चाहती थीं। योजना यह थी कि फखरुद्दीन अली अहमद के इस्तीफे के बाद इंदिरा राष्ट्रपति बन जातीं और संसद से उन्हें आजीवन राष्ट्रपति घोषित कर दिया जाता। वे इमरजेंसी के दौरान इस योजना को लागू करना चाहती थीं।
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उस वक्त ज्यादातर विरोधी नेता जेल में थे या फिर नजरबंद। इसलिए विरोध भी नहीं होता। उनका यह आइडिया इंडोनेशिया के डॉ. सुकर्ण से प्रेरित था, जो इसी तरह आजीवन राष्ट्रपति बन गए थे। पूर्व प्रधानमंत्री ने परामर्श के लिए अपने विश्वासपात्र पूर्व आईसीएस अधिकारी को बुलाया। वे जब प्रधानमंत्री निवास गए तो उनकी मुलाकात संजय गांधी और आरके धवन से हुई। उनसे सलाह ली गई कि अगर इंदिरा गांधी को आजीवन राष्ट्रपति बना दिया जाए तो विश्व में क्या प्रतिक्रिया होगी।
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इस पर विचार के लिए उन्होंने कुछ समय मांगा। कुछ दिन बाद वे इंदिरा गांधी से मिले और उन्हें बताया कि अगर उन्होंने ऐसा किया तो विश्व में इसके गलत मायने निकाले जाएंगे। उस समय इमरजेंसी लागू हुए दस महीने ही हुए थे। उन्होंने बताया कि विश्व में यह राय बन रही है कि इंदिरा तानाशाह बनती जा रही हैं। इस पूर्व अधिकारी ने कहा कि वैसे भी फखरुद्दीन अली अहमद उनके खास हैं। वह उनके किसी काम में रुकावट नहीं डालते हैं। इंदिरा तो उनके परामर्श से राजी हो गईं, लेकिन संजय गांधी नाराज हो गए।