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Independence Day 2022: ऐसी थी दीवनगी, युवावस्था में घर छोड़ कूदे जंग-ए-आजादी में, पढ़ें पातीराम के बारे में

Fri, 12 Aug 2022 05:33 PM IST
धीरेन्द्र सिंह संवाद न्यूज एजेंसी, एटा
संवाद न्यूज एजेंसी, एटा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Fri, 12 Aug 2022 05:33 PM IST
सार

पातीराम शाक्य ने युवावस्था में ही महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस से प्रेरित होकर आजादी का झंडा बुलंद कर लिया था। हालांकि उन पर अधिक असर गांधीजी का था, इसलिए अहिंसात्मक आंदोलनों में जुड़े। 

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Independence Day 2022 Story of freedom fighter Patiram Shakya of Khairpura etah
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पातीराम शाक्य का फाइल फोटो और उनका परिवार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एटा की अलीगंज तहसील क्षेत्र के गांव खैरपुरा के पातीराम शाक्य ने जंग-ए-आजादी में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। 1942 में उन्हें जेल भेजा गया। जिससे क्षेत्र में उस समय देशभक्त के रूप में उनका काफी नाम हुआ था लेकिन आजादी के बाद अपनी सरकार में उन्हें सम्मान नहीं मिल सका। गांव में कोई स्मारक या प्रतीक चिह्न ऐसा नहीं है, जिससे लोग उन्हें याद रख सकें।

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शिवचरण शाक्य के घर 1912 में जन्मे पातीराम शाक्य ने युवावस्था में ही महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस से प्रेरित होकर आजादी का झंडा बुलंद कर लिया था। हालांकि उन पर अधिक असर गांधीजी का था, इसलिए अहिंसात्मक आंदोलनों में जुड़े। अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध गतिविधियां संचालित करने के विरोध में उन्हें गिरफ्तार कर 1942 में जेल भेज दिया गया, लेकिन छूटने के बाद भी आजादी की लड़ाई का हौसला नहीं टूटा। 
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1943 में फिर जेल से उनका सामना हुआ। उस दौर में पूरे गांव में उनकी अलग ही पहचान बनी थी लेकिन वक्त के साथ वो पहचान धूमिल हो गई है। अब तो नई पीढ़ियां यह भी नहीं जानतीं कि इस गांव में कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुआ करते थे। गांव विकास से अछूता है।  वहीं उनके नाम का कोई स्मारक, प्रतिमा, मार्ग तो दूर कहीं कोई प्रतीक चिह्न तक नहीं है। उनका परिवार आज भी छोटे से मकान में रहता है और खेती पर निर्भर है। 
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उनके नाती गजेंद्र सिंह को भी गांव के बुजुर्ग लोगों से अपने बाबा की वीरता के किस्से सुनने को मिले हैं। बताते हैं कि बाबा पर अंग्रेजों ने बहुत अत्याचार किए और उनको कई बार जेल जाना पड़ा। आजादी के बाद अपने इकलौते पुत्र रामेश्वर दयाल शाक्य को देशसेवा के लिए सेना में भेजना चाहते थे लेकिन शासन-प्रशासन का कोई साथ नहीं मिला। 

खेतों में होती थीं बैठक, बनती थी रणनीति

गांव के रामवीर सिंह ने बताया कि पातीराम शाक्य सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। अपने समय में गांव की युवा पीढ़ी को अंग्रेजों से हुई लड़ाई के बारे में बताते रहते थे। उस समय खेतों में बैठक कर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की रणनीति बनाते थे। जब कोई अंग्रेज सिपाही गांव में आता था तो गांव वालों की मदद से विरोध कर भगा देते थे। एक बार उनको अंग्रेजों ने पकड़ लिया और उनका काफी उत्पीड़न किया। उनके परिवार के किसी भी सदस्य को न तो कोई सरकारी नौकरी मिली न ही कोई सुविधा। सन 1997 को 85 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया। उसके बाद भी गांव में शासन-प्रशासन द्वारा उनके परिवार की कोई सुध नहीं ली गई।

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