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नहीं रहे गौड़ीय संत अनंत दास, शिष्यों ने नम आंखों से दी अंतिम विदाई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, राधाकुंड (मथुरा)
Updated Sun, 11 Nov 2018 07:06 PM IST
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महंत अनंत दास महाराज की अंतिम यात्रा
- फोटो : अमर उजाला
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अपना पूरा जीवन राधा-कृष्ण की भक्ति को समर्पित करने वाले रघुनाथ दास गद्दी के महंत गौड़ीय संत अनंत दास महाराज का रविवार को निधन हो गया। वे 98वें वर्ष के थे। उनके निधन से हजारों शिष्यों की आंखें नम हो गईं।
देसी-विदेशी उनके शिष्य रो पड़े। हरिनाम संकीर्तन के साथ उनके पार्थिव शरीर को लेकर राधारानी कुंड-श्याम कुंड की चार परिक्रमा लगाई गई। रघुनाथ दास गद्दी पर नियम सेवा में उनके हजारों अनुयायी रुके हुए हैं।
गद्दी के संत केशवदास ने बताया है कि संत परंपरा में महाराज जी 500 वर्ष पुरानी रघुनाथ दास गद्दी के 35वें महंत थे। उन्होंने चार भाषाओं में भक्ति पर सैकड़ों ग्रंथों की रचना की। वे संस्कृत, हिंदी, बांग्ला, अंग्रेजी में देश-विदेश में प्रवचन करते थे।
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उन्होंने अपना पूरा जीवन संत सेवा और भक्ति में लगाया। गद्दी की परंपरा में संत श्यामसुंदर को कार्यवाहक महंत बनाया है। महाराज के अंतिम दर्शनों के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। इंग्लैंड, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, जर्मनी आदि देशों के अनुयायियों ने दर्शन किए।
बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, पंजाब, दिल्ली आदि प्रांतों से भक्त भी आए। महाराज को मुखाग्नि उनके वरिष्ठ शिष्य केशवदास ने दी। इस अवसर पर श्यामसुंदर, नकुलदास, राधाकृष्ण दास, बिहारी दास समेत सैकड़ों अनुयायी मौजूद थे।
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देसी-विदेशी उनके शिष्य रो पड़े। हरिनाम संकीर्तन के साथ उनके पार्थिव शरीर को लेकर राधारानी कुंड-श्याम कुंड की चार परिक्रमा लगाई गई। रघुनाथ दास गद्दी पर नियम सेवा में उनके हजारों अनुयायी रुके हुए हैं।
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गद्दी के संत केशवदास ने बताया है कि संत परंपरा में महाराज जी 500 वर्ष पुरानी रघुनाथ दास गद्दी के 35वें महंत थे। उन्होंने चार भाषाओं में भक्ति पर सैकड़ों ग्रंथों की रचना की। वे संस्कृत, हिंदी, बांग्ला, अंग्रेजी में देश-विदेश में प्रवचन करते थे।
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उन्होंने अपना पूरा जीवन संत सेवा और भक्ति में लगाया। गद्दी की परंपरा में संत श्यामसुंदर को कार्यवाहक महंत बनाया है। महाराज के अंतिम दर्शनों के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। इंग्लैंड, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, जर्मनी आदि देशों के अनुयायियों ने दर्शन किए।
बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, पंजाब, दिल्ली आदि प्रांतों से भक्त भी आए। महाराज को मुखाग्नि उनके वरिष्ठ शिष्य केशवदास ने दी। इस अवसर पर श्यामसुंदर, नकुलदास, राधाकृष्ण दास, बिहारी दास समेत सैकड़ों अनुयायी मौजूद थे।