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वातावरण में ब्लैक कार्बन का मुख्य स्रोत जीवाश्म ईंधन

Sun, 03 Oct 2021 01:54 AM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Sun, 03 Oct 2021 01:54 AM IST
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Fossil fuel, the main source of black carbon in the atmosphere of Agra
आगरा। दयालबाग शिक्षण संस्थान (डीईआई) की रसायन विज्ञान विभाग की शोधार्थी डॉ. प्रतिमा गुप्ता को बेस्ट थीसिस पुरस्कार मिला है। पुरस्कार गलगोटिया विश्वविद्यालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में 30 सितंबर को दिया गया। प्रतिमा गुप्ता ने डॉ. रंजीत कुमार के निर्देशन में ब्लैक कार्बन पर काम किया है। उनके शोध कार्य के मुताबिक आगरा में वातावरण में ब्लैक कार्बन का मुख्य स्रोत जीवाश्म ईंधन है। जिसका योगदान 61 फीसदी है।
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डॉ. प्रतिमा गुप्ता की पीएचडी की थीसिस का विषय ‘एटमॉस्फेरिक ब्लैक कार्बन करेक्टराइजेशन एंड डिपोजिशन एट अ सेमिएरिड रीजन ओवर इंडोगंगेटिक बेसिन’ है। इस शोध में ब्लैक कार्बन की वायुमंडलीय सांद्रता को मापने, इसके ड्राई डिपोजिशन का निर्धारण करने और भारत-गंगा बेसिन के अर्ध-शुष्क क्षेत्र पर आगरा में ब्लैक कार्बन सांद्रता (कन्संट्रेशन), स्रोतों का निर्धारण और विकिरण बल के आकलन से संबंधित है। प्राकृतिक सतह (पत्तियों) पर ब्लैक कार्बन के ड्राई डिपोजिशन (शुष्क जमाव) का अनुमान लगाने के लिए एक मॉडल विकसित किया गया था। वार्षिक माध्य डिपोजिशन वेलोसिटी 1.15×10-2 सेंटीमीटर प्रति सेकेंड पाया गया। जबकि औसत ड्राई डिपोजिशन रेट 88.3 माइक्रोग्राम प्रति वर्ग मीटर प्रतिदिन है। ब्लैक कार्बन के ड्राई डिपोजिशन के मापन में यह पहली रिपोर्ट है। यह क्रिटिकल लोड निकालने में मदद करेगी। आगरा में वैसे तो जीवाश्म ईंधन ब्लैक कार्बन का मुख्य स्रोत रहता है, पर मानसून के बाद सर्दियों में जैव ईंधन का योगदान अधिक होता है।
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आगरा। डॉ. प्रतिमा गुप्ता के मुताबिक ब्लैक कार्बन, पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) का एक घटक है। यह अन्य वायु प्रदूषकों के साथ जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल, डीजल, कोयला), जैव ईंधन (पराली, कंडे का धुआं आदि) के अधूरे या आंशिक दहन से वातावरण में शामिल हो जाता है। पीएम में ब्लैक कार्बन का योगदान कम है, लेकिन इसका मानव स्वास्थ्य, कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। डॉ. रंजीत कुमार का कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से ब्लैक कार्बन एरोसॉल के संबंध में चिंता जताई गई है। ऐसे में इस अध्ययन का महत्व और बढ़ जाता है।
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एसएन मेडिकल कॉलेज के वक्ष एवं क्षय रोग विभाग के डॉ. जीवी सिंह ने बताया कि ब्लैक कार्बन के अति सूक्ष्म कण श्वांस नलिकाओं में जाकर उनमें सूजन पैदा करते हैं, जिससे सांस लेने में परेशानी घबराहट एवं फेफड़ों में दिक्कत हो जाती है। अस्थमा मरीजों के लिए यह ज्यादा परेशानी का कारण बनता है।
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