{"_id":"5e402a258ebc3ee5cc5b0ff5","slug":"folk-music-tradition-will-alive-in-temples-of-vrindavan","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"तीर्थनगरी के मंदिरों में फिर गूंजेंगे लोक संगीत के स्वर, वृंदावन शोध संस्थान ने की यह पहल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
तीर्थनगरी के मंदिरों में फिर गूंजेंगे लोक संगीत के स्वर, वृंदावन शोध संस्थान ने की यह पहल
Mon, 10 Feb 2020 12:03 AM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा-वृंदावन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा-वृंदावन
Published by: मुकेश कुमार
Updated Mon, 10 Feb 2020 12:03 AM IST
विज्ञापन
वृंदावन शोध संस्थान
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कभी वृंदावन की कुंज गलियों में समाज गायन और कीर्तन के स्वर सुनाई देते थे, लुप्त होती इस परंपरा को एक बार फिर देवालयों में पुनर्जीवित करने की पहल वृंदावन शोध संस्थान करने जा रहा है। ठाकुरजी के दर्शन की अभिलाषा लेकर वृंदावन आने वाले श्रद्धालुओं को यहां के कई मंदिरों में अब जल्द ही राग गायन के स्वर भक्ति भाव के साथ सुनाई देंगे।
ब्रज के देवालयों में कभी गायन की प्रमुख परंपरा थी। प्रत्येक उत्सव के लिए अलग-अलग रचित पदावलियों का गायन मंदिरों में किया जाता था। हवेली संगीत और ध्रुपद गायन के दौरान इन मंदिरों में भक्ति भाव देखने को मिलता था। समय के साथ आए परिवर्तन ने इस परंपरा को चंद मंदिर और चंद उत्सव तक सिमट कर रख दिया।
वृंदावन के कुछ प्रमुख स्थलों पर गायन की यह परंपरा प्रतिदिन निभाई जा रही है। बाकी मंदिरों में इस परंपरा को एक बार फिर पुनर्जीवित करने की पहल वृंदावन शोध संस्थान करने जा रहा है।
विज्ञापन
संस्थान ने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय को इसका प्रस्ताव दिया है, जिसमें वृंदावन के विभिन्न मंदिरों से जुड़े युवाओं को समाज गायन में ट्रेड करते हुए इस गायन को संबंधित मंदिरों में फिर से शुरू कराया जाना है। इससे दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु समाज गायन का भी आनंद ले सकेंगे।
विज्ञापन
ब्रज के देवालयों में कभी गायन की प्रमुख परंपरा थी। प्रत्येक उत्सव के लिए अलग-अलग रचित पदावलियों का गायन मंदिरों में किया जाता था। हवेली संगीत और ध्रुपद गायन के दौरान इन मंदिरों में भक्ति भाव देखने को मिलता था। समय के साथ आए परिवर्तन ने इस परंपरा को चंद मंदिर और चंद उत्सव तक सिमट कर रख दिया।
विज्ञापन
वृंदावन के कुछ प्रमुख स्थलों पर गायन की यह परंपरा प्रतिदिन निभाई जा रही है। बाकी मंदिरों में इस परंपरा को एक बार फिर पुनर्जीवित करने की पहल वृंदावन शोध संस्थान करने जा रहा है।
विज्ञापन
संस्थान ने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय को इसका प्रस्ताव दिया है, जिसमें वृंदावन के विभिन्न मंदिरों से जुड़े युवाओं को समाज गायन में ट्रेड करते हुए इस गायन को संबंधित मंदिरों में फिर से शुरू कराया जाना है। इससे दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु समाज गायन का भी आनंद ले सकेंगे।
यहां निभाई जा रही है गायन की परंपरा
वृंदावन में समाज गायन की परंपरा आज भी टटिया स्थान, श्रीराधावल्लभ मंदिर, रसिक बिहारी मंदिर और भट्टजी की हवेली सहित कुछ और प्रमुख मंदिरों तक सीमित होकर रह गई है।
स्वामी श्रीहरिदास का गायन सुनने आया था अकबर
कहते हैं कि 16वीं शताब्दी में सम्राट अकबर संगीत सम्राट तानसेन के गुरु स्वामी श्रीहरिदास जी के गायन की ख्याति सुनकर निधिवन पहुंचा था। राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली और वृंदावन शोध संस्थान में संरक्षित इसके प्राचीन चित्र इसका प्रमाण है।
वृंदावन शोध संस्थान के अध्यक्ष आरडी पालीवाल ने बताया कि ब्रज संस्कृति का अहम हिस्सा समाज गायन की परंपरा अब लगभग चंद मंदिरों में नजर आती है। इसे रोजगार से जोड़ते हुए मंदिरों में फिर से पुनर्जीवित करने के प्रयास के तहत केंद्र सरकार को प्रस्ताव दिया है।
उन्होंने कहा कि प्रस्ताव में मंदिर दर्शन के दौरान समाज गायन यहां आने वाले श्रद्धालुओं को एक नया माहौल प्रदान करेगा। नई पीढ़ी को इसमें प्रशिक्षित करते हुए जोड़ा जाएगा। इस परंपरा के महत्व को बताने वाली पांडुलिपियां संस्थान में मौजूद हैं।
स्वामी श्रीहरिदास का गायन सुनने आया था अकबर
कहते हैं कि 16वीं शताब्दी में सम्राट अकबर संगीत सम्राट तानसेन के गुरु स्वामी श्रीहरिदास जी के गायन की ख्याति सुनकर निधिवन पहुंचा था। राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली और वृंदावन शोध संस्थान में संरक्षित इसके प्राचीन चित्र इसका प्रमाण है।
वृंदावन शोध संस्थान के अध्यक्ष आरडी पालीवाल ने बताया कि ब्रज संस्कृति का अहम हिस्सा समाज गायन की परंपरा अब लगभग चंद मंदिरों में नजर आती है। इसे रोजगार से जोड़ते हुए मंदिरों में फिर से पुनर्जीवित करने के प्रयास के तहत केंद्र सरकार को प्रस्ताव दिया है।
उन्होंने कहा कि प्रस्ताव में मंदिर दर्शन के दौरान समाज गायन यहां आने वाले श्रद्धालुओं को एक नया माहौल प्रदान करेगा। नई पीढ़ी को इसमें प्रशिक्षित करते हुए जोड़ा जाएगा। इस परंपरा के महत्व को बताने वाली पांडुलिपियां संस्थान में मौजूद हैं।