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आठ महीने बाद मथुरा जेल से रिहा हुए डॉ. कफील खान, कहा- अदालत का शुक्रगुजार हूं

Wed, 02 Sep 2020 12:18 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा Published by: Abhishek Saxena Updated Wed, 02 Sep 2020 12:18 AM IST
सार

इलाहाबाद उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) के आदेश के बाद मंगलवार रात डॉक्टर कफील को मथुरा जेल से रिहा कर दिया गया।

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Dr Kafeel In Mathura Jail Wait For High Court Orders
जेल से रिहा हुए डॉक्टर कफील खान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) के आदेश के बाद मंगलवार को डॉक्टर कफील की रिहाई हो गई। उन्हें देर रात मथुरा जेल से रिहा किया गया। करीब छह माह पूर्व गोरखपुर के डॉ. कफील को भड़काऊ भाषण देने के आरोप में मथुरा जेल में बंद कर दिया था।
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अलीगढ़ के जिलाधिकारी ने उन पर एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) लगाया था। इस कार्रवाई के खिलाफ उनके परिजन हाईकोर्ट पहुंचे थे। रिहा होने के बाद डॉ. कफील ने कहा कि मैं अदालत का शुक्रगुजार हूं, जिसने इतना अच्छा आदेश दिया। 
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हाईकोर्ट से उन्हें रिहा करने के आदेश दिए हैं। इधर, वरिष्ठ जेल अधीक्षक शैलेंद्र मैत्रेय ने बताया कि उनके पास शाम सात बजे तक रिहाई का कोई अधिकृत आदेश नहीं आया। देर रात डॉ. कफील की रिहाई हो सकी।  
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बता दें कि नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआसी) के विरोध में आपत्तिजनक भाषण देने के आरोपी बीआरडी मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर के निलंबित डॉक्टर कफील पर रासुका के तहत की गई कार्रवाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अवैध करार दिया है।

संबंधित खबर- डॉ. कफील पर रासुका लगाना अवैध, हाईकोर्ट ने दिया तुरंत रिहाई का आदेश

कोर्ट ने डॉक्टर कफील पर रासुका लगाने संबंधी डीएम अलीगढ़ के 13 फरवरी 2019 के आदेश को रद्द कर दिया है। दुबारा रासुका की अवधि बढ़ाने को भी कोर्ट ने अवैध करार देते हुए कफील खान को रिहा करने का आदेश दिया है। 

डॉ. कफील खान की मां नुजहत परवीन ने रासुका के तहत निरुद्धि के आदेश को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर चुनौती दी थी। मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति एसडी सिंह की पीठ ने इसे स्वीकार करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी की है। 

डॉ. कफील पर रासुका लगाने के आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए पीठ ने कहा कि बंदी को उसका पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं दिया गया, जिन आशंकाओं पर रासुका तामील की गई उससे संबंधित लिखित दस्तावेज उसे मुहैया नहीं कराए गए। 
 

कोर्ट में कफील द्वारा 12 दिसंबर 2019 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के गेट पर  दिए गए भाषण की सीडी दी गई। मगर इसे चलाने के लिए कोई उपकरण मुहैया नहीं कराया गया, इससे एक प्रकार से यही माना जाएगा कि उनको उन पर लगे आरोपों से संबंधित कोई दस्तावेज नहीं दिया गया। ऐसा न करना बंदी के अनुच्छेद 22(5) में मिले मौलिक अधिकार का हनन है।

पीठ ने सरकार की इस दलील को भी अस्वीकार कर दिया जिसमें कहा गया था कि कफील खान जेल में रहते हुए भी लगातार एएमयू के छात्रों के संपर्क में थे। जिससे शहर की लोक शांति भंग होने का खतरा था। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है कि कफील छात्रों से किस प्रकार से संपर्क में थे। वह राज्य की निरुद्धि में है जहां उनके पास कोई इलेक्ट्रिनिक डिवाइस नहीं थी। जिससे बाहर संपर्क हो सके। 

मुलाकतियों के जरिए संदेश बाहर भेजने का भी कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। रासुका के तहत की गई कार्रवाई में जिन तथ्यों के आधार पर बंदी द्वारा शांति व्यवस्था भंग करने की आशंका जताई गई है, उनकी पुष्टि के लिए आदेश में कोई तथ्य नहीं है। 

कोर्ट ने कहा कि कफील खान पर की गई रासुका के तहत कार्रवाई और उसकी अवधि बढ़ाने का आदेश दोनों कानून की नजर में अवैधानिक है।
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