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आईसीयू में अल्ट्रासाउंड प्रबंध न होना घातक
अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
Updated Thu, 04 Feb 2016 02:18 AM IST
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आपरेशन दौरान मौत होने पर अधिकांश मामलों में डाक्टर पर ही लापरवाही बरतने के आरोप लगते हैं। हालांकि ऐसी मौतों की बड़ी वजह आईसीयू (सघन चिकित्सा कक्ष) में अल्ट्रासाउंड की व्यवस्था न होना है। यह सुविधा हो तो ऐसे 80 फीसदी मामलों में मौत को रोका जा सकता है।
ये विचार दिल्ली के डा. श्रीकांत श्रीनिवासन ने ‘क्रिटिकेयर-2016’ के तहत में क्रिटिकल केयर में आए बदलाव पर हुई कार्यशाला में व्यक्त किए। इंटरनेशनल सेप्सिस फोरम और इंडियन सोसाइटी आफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन की ओर से आयोजित पांच दिन चलने वाले कांफ्रेंस के पहले दिन होेटल जेपी, होटल अमर, होटल पुष्पविला और होटल करन प्लाजा में कुल नौ कार्यशालाएं हुईं। होेटल जेपी के सभागार में हुई कार्यशाला में डा. श्रीनिवासन ने बताया कि गंभीर मरीजों के लिए एक-एक मिनट कीमती है। सांस नली में कुछ अटका है, रक्त का थक्का जमा है या अंदरूनी संक्रमण है, इसकी सटीक जांच अल्ट्रासाउंड से ही संभव है। आमतौर पर यह जांच होने में घंटों लग जाते हैं। यदि इसकी व्यवस्था आईसीयू में ही हो तो पांच-दस मिनट में ही सटीक इलाज शुरू हो सकता है।
डा. राजकुमार गुप्ता ने बताया कि फेफड़ों में पानी भर गया हो या हार्ट डैमेज समेत मरीज की आंतरिक स्थिति का सही जांच होने से इलाज बेहतर होगा। पुणे के डा. प्रवीण डिकोस्टा ने बताया कि कई मौकों पर दुर्घटना में घायल मरीज की नब्ज नहीं मिलती। अल्ट्रासाउंड से नब्ज देखने के अलावा अंदरूनी रक्तस्राव का भी पता चल जाता है। डा. आरएन गोयल ने बताया कि देश में पीसीपीएनडीटी एक्ट की जटिलता के चलते आईसीयू में अल्ट्रासाउंड की सुविधा से चिकित्सक दूरी बनाते हैं। इसलिए जरूरी है कि इस एक्ट को लचीला बनाया जाए। वर्कशाप में आयोजक डा. सुभाष चंद्रा, सचिव डा. रणवीर त्यागी, डा. राकेश त्यागी, डा. दीप्तिमाला अग्रवाल, डा. राजकुमार गुप्ता, डा. अपूर्व मित्तल, डा. नीरज यादव ने भी वर्कशाप में भाग लिया।
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कम प्यास किडनी रोग का संकेत
लंदन के डा. रवि कुमार ने बताया कि भारत में किडनी संक्रमण का खतरा सर्वाधिक है। इसका कारण दूषित पानी है। उन्होंने बताया कि कम प्यास लगने और मूत्र का कम आना भी किडनी में गड़बड़ी के संकेत हो सकते हैं। ऐसे में नजरअंदाज किए बिना जांच ही बेहतर है। उन्होंने बढ़ते एमडीआर (मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट) मरीजों पर भी चिंता जताई। इसके लिए हैवी डोेज की एंटीबायोटिक हैं। इसका कारण डाक्टर पर मरीज को जल्द ठीक करने का दबाव भी है।
प्राइमरी चिकित्सा को हो जागरूकता
इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर के अध्यक्ष डा. शिवकुमार अय्यर ने होटल अमर में हुई कार्यशाला में कहा कि सड़क हादसे बढञ रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि अब आम लोगों को भी प्राथमिक चिकित्सा के लिए प्रशिक्षित किया जाए। डा.अय्यर ने बताया कि दुर्घटना में मूर्छित व्यक्ति की प्राथमिक उपचार के तौर पर कृत्रिम सांस और हृदय की मसाज करके प्राणरक्षा की जा सकती है।
मोबाइल से ही अल्ट्रासाउंड
इलाज में सुविधा के लिए अब ऐसे मोबाइल भी उपलब्ध हैं, जिसमें अल्ट्रासाउंड की सुविधा है। अमेरिका, फ्रांस में इसका प्रयोग शुरू हो गया है। गंभीर मरीज की जान बचाने में ये मददगार होते हैं।
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ये विचार दिल्ली के डा. श्रीकांत श्रीनिवासन ने ‘क्रिटिकेयर-2016’ के तहत में क्रिटिकल केयर में आए बदलाव पर हुई कार्यशाला में व्यक्त किए। इंटरनेशनल सेप्सिस फोरम और इंडियन सोसाइटी आफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन की ओर से आयोजित पांच दिन चलने वाले कांफ्रेंस के पहले दिन होेटल जेपी, होटल अमर, होटल पुष्पविला और होटल करन प्लाजा में कुल नौ कार्यशालाएं हुईं। होेटल जेपी के सभागार में हुई कार्यशाला में डा. श्रीनिवासन ने बताया कि गंभीर मरीजों के लिए एक-एक मिनट कीमती है। सांस नली में कुछ अटका है, रक्त का थक्का जमा है या अंदरूनी संक्रमण है, इसकी सटीक जांच अल्ट्रासाउंड से ही संभव है। आमतौर पर यह जांच होने में घंटों लग जाते हैं। यदि इसकी व्यवस्था आईसीयू में ही हो तो पांच-दस मिनट में ही सटीक इलाज शुरू हो सकता है।
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डा. राजकुमार गुप्ता ने बताया कि फेफड़ों में पानी भर गया हो या हार्ट डैमेज समेत मरीज की आंतरिक स्थिति का सही जांच होने से इलाज बेहतर होगा। पुणे के डा. प्रवीण डिकोस्टा ने बताया कि कई मौकों पर दुर्घटना में घायल मरीज की नब्ज नहीं मिलती। अल्ट्रासाउंड से नब्ज देखने के अलावा अंदरूनी रक्तस्राव का भी पता चल जाता है। डा. आरएन गोयल ने बताया कि देश में पीसीपीएनडीटी एक्ट की जटिलता के चलते आईसीयू में अल्ट्रासाउंड की सुविधा से चिकित्सक दूरी बनाते हैं। इसलिए जरूरी है कि इस एक्ट को लचीला बनाया जाए। वर्कशाप में आयोजक डा. सुभाष चंद्रा, सचिव डा. रणवीर त्यागी, डा. राकेश त्यागी, डा. दीप्तिमाला अग्रवाल, डा. राजकुमार गुप्ता, डा. अपूर्व मित्तल, डा. नीरज यादव ने भी वर्कशाप में भाग लिया।
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कम प्यास किडनी रोग का संकेत
लंदन के डा. रवि कुमार ने बताया कि भारत में किडनी संक्रमण का खतरा सर्वाधिक है। इसका कारण दूषित पानी है। उन्होंने बताया कि कम प्यास लगने और मूत्र का कम आना भी किडनी में गड़बड़ी के संकेत हो सकते हैं। ऐसे में नजरअंदाज किए बिना जांच ही बेहतर है। उन्होंने बढ़ते एमडीआर (मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट) मरीजों पर भी चिंता जताई। इसके लिए हैवी डोेज की एंटीबायोटिक हैं। इसका कारण डाक्टर पर मरीज को जल्द ठीक करने का दबाव भी है।
प्राइमरी चिकित्सा को हो जागरूकता
इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर के अध्यक्ष डा. शिवकुमार अय्यर ने होटल अमर में हुई कार्यशाला में कहा कि सड़क हादसे बढञ रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि अब आम लोगों को भी प्राथमिक चिकित्सा के लिए प्रशिक्षित किया जाए। डा.अय्यर ने बताया कि दुर्घटना में मूर्छित व्यक्ति की प्राथमिक उपचार के तौर पर कृत्रिम सांस और हृदय की मसाज करके प्राणरक्षा की जा सकती है।
मोबाइल से ही अल्ट्रासाउंड
इलाज में सुविधा के लिए अब ऐसे मोबाइल भी उपलब्ध हैं, जिसमें अल्ट्रासाउंड की सुविधा है। अमेरिका, फ्रांस में इसका प्रयोग शुरू हो गया है। गंभीर मरीज की जान बचाने में ये मददगार होते हैं।