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कहीं पतंग को जासूसी का कोड न बना ले ‘भट्टी’

Mon, 08 Jun 2015 01:16 AM IST
चन्द्र मोहन शर्मा/आगरा
चन्द्र मोहन शर्मा/आगरा Updated Mon, 08 Jun 2015 01:16 AM IST
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beware: bhatti may use kite for spying
यह किस्सा है सेंट्रल जेल की हाई सिक्योरिटी बैरक में बंद पाकिस्तानी
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जासूस शाहिद इकबाल भट्टी उर्फ देवराज सहगल का। वह जितना हुनरमंद है, उतना ही शातिर भी है। कंप्यूटर का मास्टरमाइंड है तो जासूसी का जेम्स बांड भी। उसके कारनामे देखिए। मोहाली में भारत-पाक मैच देखने के बहाने आया और पहुंच गया सहारनपुर। वहां 2004 से 2007 के बीच उसने धोखेबाजी से देवराज सहगल नाम से अपना वोटर कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, पेन कार्ड बनवा लिए। बैंक में खाते ही नहीं खोले, लोन भी ले लिया। अपना कंप्यूटर सेंटर भी खोला और कंप्यूटर सिखाने के बहाने कई गर्लफ्रैंड भी बना लीं।
इसके बाद इसी नाम से पहुंचा पटियाला और शुरू कर दी सेना की जासूसी। वह खुद को बताता था कंप्यूटर टीचर लेकिन काम करता था आईएसआई के लिए जासूसी का। वह सेना के टैंक मूवमेंट की जानकारी ई-मेल से पाकिस्तान भेजता था। उसे 2008 में बड़ी मुश्किल से पकड़ा गया। सहारनपुर में कोर्ट से सजा मिल जाने से आगरा सेंट्रल जेल पहुंचा तो अधिकारियों की नजरों में आने के लिए करतब शुरू कर दिए। अखबार के कागज से हजारों लिफाफे बना दिए। गोंद भी नहीं मांगा, दलिए से ही चिपका दिए। बंदी रक्षक उसके हुनर से प्रभावित हो गए तो उनके सामने ख्वाहिश रख दी पतंग बनाने की। इसके लिए सामान भी मांगा।
जेल सूत्रों का कहना है कि शुरू में तो अधिकारी उसे सामान दिलाने के लिए तैयार थे, लेकिन जब उसके कारनामों का पता चला तो कदम पीछे खींच लिए। डर हो गया कि कहीं वह पतंग को ही जासूसी का कोड न बना ले। इसी डर से उसके बनाए लिफाफे भी जेल से बाहर नहीं जाने दिए गए हैं। हालांकि जेल अधिकारी इस मामले में कुछ बोलने को तैयार नहीं।

..तो संस्थाओं ने भी कदम खींचे
जेल में हुनरमंद कैदियों की मदद करने वाली कई संस्थाओं को भी भट्टी के हुनर की जानकारी जेल प्रशासन ने दी। इन संस्थाओं ने भी शुरू में दिलचस्पी दिखाई, लेकिन उसके कारनामे जानकर पीछे हट गईं। इन्हें भी यह डर सताया कि कहीं उसकी मदद के चक्कर में मुसीबत में न फंस जाएं।
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