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42 घंटे मुसीबत में रहे सूर सरोवर के हजारों परिंदे

Sat, 16 Apr 2016 01:45 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Sat, 16 Apr 2016 01:45 AM IST
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birds will be in danger in 42 hours
‌चिड़िया
ईको सेंसटिव जोन सूर सरोवर पक्षी विहार में हजारों परिंदे 42 घंटों तक मुसीबत में रहे। शांत रहने वाले वातावरण में धड़-धड़ करती जेसीबी मशीन के शोर ने इनके सुकून में खलल डाला। मशीन के धुएं ने परेशानी बढ़ा दी। कानफोड़ू शोर में पक्षी एक दूसरे के कलरव से भी महरूम रहे। खोदाई से मछलियां मर गई। उन्हें झील में ही दूसरी जगह फेंक दिया गया। इसकी जानकारी मीडिया तक पहुंची तो वन विभाग के अधिकारियों ने आनन फानन में काम बंद करा दिया। अधिकारी अब सफाई दे रहे हैं कि निमयों में खास परिस्थति में मशीन के इस्तेमाल का प्रावधान है।
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पर्यावरणविद डीके जोशी ने विभाग के इस कदम पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह गंभीर मामला है। सिल्ट हटाने के और भी तरीके हैं। पक्षियों को परेशान करने की जरूरत नहीं थी। बता दें, कीठम झील के कुछ हिस्सों में सिल्ट अधिक हो जाने के कारण इसमें पानी कम भर पा रहा था।
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वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इससे मछलियों के जीवन पर संकट खड़ा हो रहा था। इसी को देखते हुए झील के इस हिस्से की सफाई के लिए जेसीबी की मदद ली। पहले तो इस झील के इस हिस्से में से पानी निकाला गया। मछलियों को मरने से बचाने के लिए उन्हें झील के दूसरे हिस्से में शिफ्ट यिा गया। इससे कुछ मछलियां मर गईं। इसके बाद मंगलवार दोपहर बाद झील के इस हिस्से को गहरा करने के लिए बुलडोजर लगाए गए। बुधवार और गुरुवार को इनसे दिनभर सिल्ट निकाली गई। इसके बाद पूरे क्षेत्र को समतल कर दिया गया। शुक्रवार को जब वन विभाग की यह कारगुजारी उजागर हुई। अधिकारियों ने काम रुकवा दिया है। झील का यह हिस्सा अधूरा ही छोड़ दिया गया।
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सिल्ट पूरी तरह से नहीं निकाली जा सकी है। हालांकि कीठम के रेंजर अवध विहारी का कहना है कि कुछ भी नियम विरुद्ध नहीं किया गया है। जरूरत पड़ने पर डिसिल्टिंग के लिए यांत्रिकी का प्रयोग किया जा सकता है। इसी के तहत बुलडोजर लगभग 50 घंटे प्रयोग किया गया। खोदाई के लिए 42 घंटे जेसीबी लगाई गई थी।

पर्यावरण और पक्षियों की दृष्टि से ईको सेंसटिव जोन में मशीनों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। डिसिल्टिंग के और भी तरीके हो सकते थे। मामला गंभीर है।
डीके जोशी, पर्यावरणविद
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