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भगवान वराह के विश्रामस्थल पर मत्था टेके बिना पूरा नहीं होता श्राद्धकर्म
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कासगंज की सोरों तीर्थनगरी में भगवान वराह का विश्राम स्थल
- फोटो : KASGANJ
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सोरों (कासगंज)। पितृपक्ष में श्रद्धालु तीर्थनगरी में प्रतिदिन तर्पण को पहुंच रहे हैं। मान्यता है कि भगवान वराह के विश्रामस्थल पर श्राद्धकर्म के बाद मत्था टेकने पर ही श्राद्धकर्म पूरा माना जाताहै। इसी मान्यता के तहत यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु विधि विधानपूर्वक परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।
तीर्थपुरोहित के मंत्रोच्चारण के साथ यहां श्रद्धालु मत्था टेकते हैं।
राजस्थान, मध्यप्रदेश के साथ ही दूरदराज इलाकों से श्रद्धालु तीर्थनगरी में तिथिवार श्राद्ध कर्म कर रहे हैं। गंगा स्नान कर पितरों को जल तर्पण कर रहे हैं वहीं वराह घाट पहुंचकर भगवान वराह के विश्रामस्थल पर रखे चक्ररूपी पत्थर पर मत्था टेककर जयकारे लगा रहे हैं। इसके अलावा परिक्रमा मार्ग पर परिक्रमा लगाने के बाद देव मंदिरों में दर्शन कर रहे हैं।
वराहमंत्र के जाप से मिलती है भुक्ति-मुक्ति
- विश्रामस्थल वह स्थान है जहां भगवान वराह ने हिरण्यकश्यप नाम के दैत्य का मारकर पृथ्वी का उद्धार कर विश्राम किया था। जल तर्पण के बाद यहां मत्था टेकने से पितृ प्रसन्न होकर अपनी संतानों को दीर्घायु और खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं। भगवान श्रीहरि के दर्शन करने और 108 बार प्रतिदिन ऊं वराहाय नम: मंत्र का जाप करने से भुक्ति और मुक्ति मिलती है। श्राद्धकर्म पूरे विधि विधानपूर्व करना चाहिए।
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- पंडित नरेश त्रिगुनायत
भगवान वराह की लीला से ही यहां विलिन होती हैं अस्थियां
- जब भगवान वराह ने ब्राह्मण कुल के हिरण्यकश्यप का वध किया था। इसके बाद ब्रह्म हत्या के कारण उनका श्वेतरूप श्यामरूप हो गया था। ब्रह्म हत्या के श्राप से मुक्ति के लिए भगवान वराह ने उपयुक्त स्थल की खोज की। धर्मतुला पर सभी तीर्थों को तौलने के बाद सोरों को सर्वोत्कृष्ट माना और यहां व्रत एवं तप किया। तीन रेखाएं खींची। इनमें से मां गंगा का उद्भव हुआ, जिसे हरिपदी गंगा कहते हैं। भगवान वराह की लीला है कि यहां विसर्जित की जाने वालीं अस्थियां 72 घंटे में विलीन हो जाती ह्रैं।
- पंडित राममोहन महेरे।
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तीर्थपुरोहित के मंत्रोच्चारण के साथ यहां श्रद्धालु मत्था टेकते हैं।
राजस्थान, मध्यप्रदेश के साथ ही दूरदराज इलाकों से श्रद्धालु तीर्थनगरी में तिथिवार श्राद्ध कर्म कर रहे हैं। गंगा स्नान कर पितरों को जल तर्पण कर रहे हैं वहीं वराह घाट पहुंचकर भगवान वराह के विश्रामस्थल पर रखे चक्ररूपी पत्थर पर मत्था टेककर जयकारे लगा रहे हैं। इसके अलावा परिक्रमा मार्ग पर परिक्रमा लगाने के बाद देव मंदिरों में दर्शन कर रहे हैं।
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वराहमंत्र के जाप से मिलती है भुक्ति-मुक्ति
- विश्रामस्थल वह स्थान है जहां भगवान वराह ने हिरण्यकश्यप नाम के दैत्य का मारकर पृथ्वी का उद्धार कर विश्राम किया था। जल तर्पण के बाद यहां मत्था टेकने से पितृ प्रसन्न होकर अपनी संतानों को दीर्घायु और खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं। भगवान श्रीहरि के दर्शन करने और 108 बार प्रतिदिन ऊं वराहाय नम: मंत्र का जाप करने से भुक्ति और मुक्ति मिलती है। श्राद्धकर्म पूरे विधि विधानपूर्व करना चाहिए।
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- पंडित नरेश त्रिगुनायत
भगवान वराह की लीला से ही यहां विलिन होती हैं अस्थियां
- जब भगवान वराह ने ब्राह्मण कुल के हिरण्यकश्यप का वध किया था। इसके बाद ब्रह्म हत्या के कारण उनका श्वेतरूप श्यामरूप हो गया था। ब्रह्म हत्या के श्राप से मुक्ति के लिए भगवान वराह ने उपयुक्त स्थल की खोज की। धर्मतुला पर सभी तीर्थों को तौलने के बाद सोरों को सर्वोत्कृष्ट माना और यहां व्रत एवं तप किया। तीन रेखाएं खींची। इनमें से मां गंगा का उद्भव हुआ, जिसे हरिपदी गंगा कहते हैं। भगवान वराह की लीला है कि यहां विसर्जित की जाने वालीं अस्थियां 72 घंटे में विलीन हो जाती ह्रैं।
- पंडित राममोहन महेरे।