अगस्त क्रांति: आगरा की गली-गली में गूंजा था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा, शहर से देहात तक हुए थे प्रदर्शन
आगरा के कांग्रेस नेताओं तक आंदोलन की जानकारी पहुंचाने के लिए पार्टी मुख्यालय से तार भेजा गया था। इसकी भनक पुलिस को लग गई थी।
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अगस्त क्रांति की ज्वाला ताजनगरी में भी धधकी थी। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ की गूंज हर गली-मोहल्ले में सुनवाई दे रही थी। आठ अगस्त को महात्मा गांधी की हुंकार के बाद हर आगरा जिले में प्रदर्शन शुरू हो गए थे। आगरा के अधिकांश क्रांतिकारियों को अंग्रेज हुकूमत ने जेल में डाल दिया था। कुछ अंडरग्राउंड हो गए थे। लेकिन जज्बा ऐसा कि आम लोगों ने जुलूस निकाल कर अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था।
नौ अगस्त, 1942 को अगस्त क्रांति की शुरुआत हुई थी। कांग्रेस के बम्बई अधिवेशन के दौरान महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया था। चार जुलाई, 1942 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित किया था। जिसमें कहा गया था कि यदि अंग्रेज भारत नहीं छोड़ते हैं तो उनके खिलाफ नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाएगा। महात्मा गांधी ने आठ अगस्त को अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत कर दी थी।
तार से भेजी थी जानकारी
आगरा के कांग्रेस नेताओं तक आंदोलन की जानकारी पहुंचाने के लिए पार्टी मुख्यालय से तार भेजा गया था। इसकी भनक पुलिस को लग गई थी। अंग्रेजों ने तमाम कांग्रेस नेताओं व क्रांतिकारियों को जेल में डाल दिया। इतिहासकार बताते हैं कि आंदोलन के आगरा प्रमुख बाबूलाल मित्तल भूमिगत होकर वृंदावन चले गए थे।
वहां उन्हें आंदोलन को तेज करने के निर्देश मिले। वह आगरा आए और फुलट्टी बाजार के एक मकान में गुप्त बैठक बुलाई। चुनिंदा लोग शामिल हुए और आंदोलन की रूपरेखा बनी। इसके बाद आंदोलन पूरे जिले में फैल गया। बड़े-छोटे जुलूस निकाले गए। थाने-चौकियों और सरकारी दफ्तरों के बाहर भीड़ ने मशाल लेकर प्रदर्शन किए। कई दिनों तक प्रदर्शन चले।
'आगरा का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा'
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रानी सरोज गौरिहार ने कहा कि अगस्त क्रांति के आंदोलन में आगरा का नाम हमेशा स्वर्ण अक्षरों में लिखा है। क्रांतिकारियों ने यहां अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए थे। फुलट्टी में बैठक के बाद आंदोलन ने स्थानीय स्तर पर रफ्तार पकड़ी थी। बेलनगंज में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुआ था।
'अंग्रेज गिरफ्तारी के लिए आए तो भगा दिया था'
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिजन के शशि शिरोमणि ने बताया कि मेरे पिता प्रकाश नारायण शिरोमणी और चाचा गोपाल शिरोमणी ने स्थानीय आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बेलनगंज और फुलट्टी में हुए प्रदर्शनों के दौरान जब अंग्रेज गिरफ्तारी करने के लिए आए थे तो उन्हें भगा दिया था। क्रांतिकारियों ने छतों पर चढ़ कर नारे लगाए थे। अंग्रेज अफसर वहां से भाग खड़े हुए थे।