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करीमगंज के टीले से मिल सकती हैं प्राचीन धरोहरें
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मैनपुरी। कसबा करीमगंज स्थित टीले से ऐतिहासिक धरोहरें सामने आ सकती हैं। मंगलवार को पुरातत्व विभाग की टीम के निरीक्षण के बाद लोगों को उत्खनन का इंतजार है। अब तक मिलीं मूर्तियां, पत्थर प्राचीन इतिहास की तरफ इशारा कर रहे हैं।
करीमगंज का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। दशकों से यहां पत्थर और अवशेष मिलते रहे हैं लेकिन तब किसी ने ध्यान नहीं दिया। इस बार मूर्तियों के अवशेष और रंगीन पत्थर मिले तो सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी फैल गई। जुलाई के अंतिम सप्ताह में टीले से ये पत्थर और अवशेष मिले थे। इसके बाद से ही लोगों को टीले की खुदाई का इंतजार है। लोगों का मानना है कि अगर टीले की खुदाई होती है तो इससे और भी प्राचीन इतिहास सामने आ सकता है। मंगलवार को पुरातत्व विभाग की टीम द्वारा टीले का निरीक्षण किया गया है।
12वीं सदी से जुड़ा है करीमगंज का इतिहास
जिला मुख्यालय से कुरावली रोड पर आठ किलोमीटर दूरी पर बसा कस्बा करीमगंज 12वीं सदी से जुड़ाव रखता है। तब इसे रूपायन नाम से जाना जाता था। अनाज और सब्जियों का व्यापार होता था। इलाहाबाद से मथुरा जाने वाले कच्चे मार्ग पर होने के कारण प्रसिद्ध था। तब यहां किला हुआ करता था। सन 1280 में किले को एटा के नवाब करीम खान ने अपने दो कर्मचारी अमोल और घनश्याम की इच्छा पर ध्वस्त कर दिया था। किला ध्वस्त कर अमोल और घनश्याम को यहां बसा दिया। ये किला ही टीले में बदल गया।
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करीमगंज का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। दशकों से यहां पत्थर और अवशेष मिलते रहे हैं लेकिन तब किसी ने ध्यान नहीं दिया। इस बार मूर्तियों के अवशेष और रंगीन पत्थर मिले तो सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी फैल गई। जुलाई के अंतिम सप्ताह में टीले से ये पत्थर और अवशेष मिले थे। इसके बाद से ही लोगों को टीले की खुदाई का इंतजार है। लोगों का मानना है कि अगर टीले की खुदाई होती है तो इससे और भी प्राचीन इतिहास सामने आ सकता है। मंगलवार को पुरातत्व विभाग की टीम द्वारा टीले का निरीक्षण किया गया है।
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12वीं सदी से जुड़ा है करीमगंज का इतिहास
जिला मुख्यालय से कुरावली रोड पर आठ किलोमीटर दूरी पर बसा कस्बा करीमगंज 12वीं सदी से जुड़ाव रखता है। तब इसे रूपायन नाम से जाना जाता था। अनाज और सब्जियों का व्यापार होता था। इलाहाबाद से मथुरा जाने वाले कच्चे मार्ग पर होने के कारण प्रसिद्ध था। तब यहां किला हुआ करता था। सन 1280 में किले को एटा के नवाब करीम खान ने अपने दो कर्मचारी अमोल और घनश्याम की इच्छा पर ध्वस्त कर दिया था। किला ध्वस्त कर अमोल और घनश्याम को यहां बसा दिया। ये किला ही टीले में बदल गया।
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