श्री पारस अस्पताल: चार पीड़ितों की तहरीर पर नहीं हुई थी कार्रवाई, अधिवक्ता करेंगे मुकदमे की मांग
श्री पारस अस्पताल प्रकरण को लेकर युवा अधिवक्ता संघ के पदाधिकारी और पैनल के सदस्य एसएसपी और आईजी से मुलाकात करेंगे। अधिवक्ता संघ ने पुलिस और प्रशासन की जांच पर कई सवाल उठाए हैं।
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आगरा के श्री पारस अस्पताल के मालिक डॉ. अरिंजय जैन का ऑक्सीजन की मॉकड्रिल को लेकर वायरल वीडियो सामने आने के बाद भ्रम फैलाने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया। मगर, 25 दिन बाद भी पुलिस की जांच एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकी है। वीडियो को लेकर की जा रही पड़ताल अब तक पूरी नहीं हो सकी है।
वीडियो बनाने वाले का पता नहीं चला है। पुलिस की जांच पर कई सवाल उठ रहे हैं। मृतकों के पीड़ित अब तक भटकने के लिए मजबूर हैं। अधिवक्ताओं के पैनल के पास चार पीड़ितों ने शिकायत की है। सोमवार को अधिवक्ता इन पीड़ितों की शिकायत लेकर एसएसपी और आईजी से मिलेंगे। इनके मामलों में मुकदमा दर्ज करने की मांग की जाएगी।
युवा अधिवक्ता संघ के मंडल अध्यक्ष नितिन वर्मा ने बताया कि पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही है। इस पर एक बार फिर से अधिकारियों से मुलाकात करने जाएंगे। एसएसपी और आईजी से प्रकरण में मुकदमा दर्ज करके विवेचना की मांग की जाएगी। मुकदमा दर्ज किया जाना पीड़ितों का हक है। प्रतिनिधिमंडल में संरक्षक सुनील शर्मा, उमेश वर्मा, नरेंद्र कुमार शर्मा, कृष्ण मुरारी माहेश्वरी, राजीव ठाकुर, हरिशंकर सिंह आदि शामिल रहेंगे।
पीड़ितों के बयान
मैनपुरी के बेवर निवासी क्षितिज शर्मा ने अधिवक्ताओं के पैनल से शिकायत की थी। कहा कि उनकी मां सीमा शर्मा की 26 अप्रैल को श्री पारस अस्पताल में मौत हो गई थी। इसमें ऑक्सीजन बंद होने से मौत का आरोप लगाया। क्षितिज ने अपने प्रशासन की टीम को दिए बयान में यह भी कहा था। मगर, बयान को जांच में शामिल नहीं किया गया।
राजामंडी के मालवीय कुंज निवासी गीतिमा ग्रोवर ने अधिवक्ताओं को प्रार्थनापत्र देते हुए कहा है कि उनकी भाभी मीना ग्रोवर का श्री पारस अस्पताल में 26 अप्रैल को निधन हो गया था। इस मामले में अस्पताल मालिक के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
इटावा निवासी राजू सिंह यादव के बहनोई की मौत हुई थी। उनका आरोप था कि अस्पताल प्रशासन ने ऑक्सीजन मंगवाई, लेकिन दे नहीं सके। अस्पताल की तरफ से आक्सीजन नहीं लगाई गई, जिससे मौत हुई। उन्होंने भी कार्रवाई की मांग की
छत्ता निवासी अशोक चावला के पिता की 26 अप्रैल को मौत हुई थी, जबकि उनके भाई की पत्नी की 27 अप्रैल को मौत हुई। दोनों ही मृत्यु के लिए अशोक चावला ने डॉ. अरिंजय जैन को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कार्रवाई की मांग की है।
1. डॉक्टर के वीडियो के मामले में महामारी एक्ट में मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने वीडियो बनाने के शक में कई लोगों से पूछताछ की। एक युवक के मोबाइल को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया। 15 दिन बाद भी रिपोर्ट नहीं आई। मोबाइल की रिपोर्ट लेने में पुलिस देरी क्यों करा रही है। फोरेंसिक लैब से पैरवी क्यों नहीं की जा रही है।
2. पुलिस एक मात्र डॉक्टर के बयान के आधार पर वीडियो बनाने वाले की तलाश कर रही है, जबकि उनकी ऑक्सीजन को लेकर स्वीकारोक्ति पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। पीड़ित शिकायत भी दर्ज करा चुके हैं। फिर क्यों नहीं सुनवाई हो रही है, जबकि यह प्रकरण गंभीर है।
3. साल 2020 में भी श्रीपारस हॉस्पिटल पर कार्रवाई हुई थी। कोरोना संक्रमण फैलाने के आरोप में महामारी अधिनियम में मुकदमा दर्ज हुआ था। इसके बाद हॉस्पिटल पर सील लगाई गई। इसके बावजूद हास्पिटल की सील को खोल दिया गया, जबकि केस अभी कोर्ट में विचाराधीन है।
4. डीएम की कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दी। मगर, इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया कि 26 अप्रैल को रात 12 बजे के बाद हास्पिटल में कितने मरीजों की मौत हुई।
एक और पीड़ित आया सामने, पैनल से की शिकायत
अधिवक्ताओं के पैनल से सरस्वती नगर फेस तृतीय निवासी पवनेश ने शिकायत की। उन्होंने कहा है कि मेरे पति अखिलेश हरि त्रिवेदी 12 अप्रैल को कोरोना संक्रमित हो गए थे। एक सप्ताह तक पति का इलाज घर में ही चला। 16 अप्रैल को आक्सीजन लेबल कम होने पर नयति अस्पताल में भर्ती कराया। तीन भर्ती होने पर भी हालत में सुधार नहीं हुआ।
अस्पताल प्रशासन ने रेफर करने को कहा। मगर, बिना कोरोना जांच रिपोर्ट के कारण किसी अस्पताल में भर्ती नहीं किया। श्रीपारस हास्पिटल में तत्काल भर्ती कर लिया गया। 30 हजार रुपये जमा कराए गए। मगर, ठीक से इलाज नहीं किया गया। 23 अप्रैल को पति की मौत हो गई। पवनेश ने कार्रवाई की मांग की है।
चिकित्सा में मॉकड्रिल का कोई स्थान नहीं
युवा अधिवक्ता संघ के योगेश लवानिया ने कहा कि वायरल वीडियो में डॉक्टर ने मॉकड्रिल शब्द का प्रयोग किया। चिकित्सा पद्धति में मॉकड्रिल शब्द का कोई स्थान नहीं है। इस शब्द का प्रयोग सिर्फ पुलिस और सेना में ही किया जाता है। मेडिकल में ऐसा करनी की किसी को इजाजत नहीं है। इस मामले में मुकदमे का प्रमुख आधार है।
वीडियो बनाने वाले की तलाश क्यों
युवा अधिवक्ता संघ के अरुण तेरिया ने कहा कि पुलिस मुकदमे में सबसे पहले अपनी जांच वीडियो बनाने वाले की तलाश से कर रही है। मगर, जब वीडियो पुलिस के पास है। उसमें डॉक्टर बोलते नजर आ रहे हैं तो वीडियो बनाने वाले की तलाश से क्या फायदा। जब डॉक्टर की तरफ किसी तरह की ब्लैकमेलिंग की तहरीर ही नहीं दी गई तो फिर ऐसा क्यों किया जा रहा है।