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Agra News: लाजवाब है बटेश्वर मेले के खजले का जायका
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बटेश्वर में खजला की दुकान
सजी है नमकीन, मीठे, खोआ वाले खजले की दुकानें, खरीदे बिना नहीं लौटते श्रद्धालु बाह। बटेश्वर मेला जितना पुराना है, उतनी ही पुरानी यहां पर खजला बनाने और बेचने की परंपरा है। खजला कुरकुरापन लिए परतों के लिए जाना जाता है। चासनी में पगे खजले पर चढ़ी खोआ और रबड़ी की परत इसके जायके को लाजबाव बना देती है। बटेश्वर मेले में पहुंचने वाले श्रद्धालु खजले का जायके के मुरीद हैं।
बटेश्वर मेले में खजले का बाजार अलग से सजा है। दुकानों पर नमकीन, मीठे, खोआ, रबड़ी वाले खजले मिल रहे हैं। मेले में पहुंचने वाले श्रद्धालु कुछ लें या न लें खजला जरूर खरीदते हैं। राजाखेड़ा की रानी, प्रमिला, अंबाह की मिथिलेश, उमाशंकर, गोविंद, भिंड के अतर सिंह, दीपक, गोमती, बाह के मान सिंह, राजीव शर्मा, बाबूराम, मीनाक्षी, राधा, ममता, फिरोजाबाद के राजकुमार गुप्ता, मनोज कुमार, रेशम देवी ने बताया कि बटेश्वर मेले में खजला खाया है। खरीद कर घर के लिए भी ले जा रहे हैं। परिवार के सभी लोगों को खजला खूब पसंद है। औरैया के खजला कारोबारी आलोक कुमार ने बताया कि मीठा खजला 150 रुपये किलो, खोआ खजला 250 से 300 रुपये किलो, रबड़ी खजला 260 से 320 रुपये किलो, नमकीन खजला 40 रुपये प्रति नग के हिसाब से बिक रहा है। संवाद
ऐसे बनता है खजला, पीढ़ी दर पीढ़ी जुटे हैं परिवार
खजला तैयार करने में मुख्य रूप से मैदा, चीनी और घी का इस्तेमाल किया जाता है। इसे छोले भटूरे की तरह पकाया जाता है। सबसे पहले मैदा या आटे को अच्छी तरह गूंथा जाता है। बेलकर कई परतें बनाई जाती है। इसके बाद तेल या घी में धीमी आग पर सुनहरा होने तक तला जाता है। कुरकुरापन आने के बाद चाशनी में डुबोया जाता है। इसके बाद खोआ या रबड़ी की परत चढ़ाई जाती हैं और बेचने के लिए दुकान पर रख दिया जाता है। इस काम को कई कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी अंजाम दे रहे है। इटावा के रामौतार ने तो बटेश्वर मेला में पूरा बाजार सजा रखा है। बोले चार पीढियों से इसी काम से जुड़े हुए हैं। इटावा के अरविंद कुमार 20 साल से खजले के कारोबार में जुटे हुए हैं। वैदपुरा के मनोज गुप्ता ने बताया कि वह कई वर्षों से यहां पर खजले की दुकान लगा रहे हैं।
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बटेश्वर मेले में खजले का बाजार अलग से सजा है। दुकानों पर नमकीन, मीठे, खोआ, रबड़ी वाले खजले मिल रहे हैं। मेले में पहुंचने वाले श्रद्धालु कुछ लें या न लें खजला जरूर खरीदते हैं। राजाखेड़ा की रानी, प्रमिला, अंबाह की मिथिलेश, उमाशंकर, गोविंद, भिंड के अतर सिंह, दीपक, गोमती, बाह के मान सिंह, राजीव शर्मा, बाबूराम, मीनाक्षी, राधा, ममता, फिरोजाबाद के राजकुमार गुप्ता, मनोज कुमार, रेशम देवी ने बताया कि बटेश्वर मेले में खजला खाया है। खरीद कर घर के लिए भी ले जा रहे हैं। परिवार के सभी लोगों को खजला खूब पसंद है। औरैया के खजला कारोबारी आलोक कुमार ने बताया कि मीठा खजला 150 रुपये किलो, खोआ खजला 250 से 300 रुपये किलो, रबड़ी खजला 260 से 320 रुपये किलो, नमकीन खजला 40 रुपये प्रति नग के हिसाब से बिक रहा है। संवाद
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ऐसे बनता है खजला, पीढ़ी दर पीढ़ी जुटे हैं परिवार
खजला तैयार करने में मुख्य रूप से मैदा, चीनी और घी का इस्तेमाल किया जाता है। इसे छोले भटूरे की तरह पकाया जाता है। सबसे पहले मैदा या आटे को अच्छी तरह गूंथा जाता है। बेलकर कई परतें बनाई जाती है। इसके बाद तेल या घी में धीमी आग पर सुनहरा होने तक तला जाता है। कुरकुरापन आने के बाद चाशनी में डुबोया जाता है। इसके बाद खोआ या रबड़ी की परत चढ़ाई जाती हैं और बेचने के लिए दुकान पर रख दिया जाता है। इस काम को कई कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी अंजाम दे रहे है। इटावा के रामौतार ने तो बटेश्वर मेला में पूरा बाजार सजा रखा है। बोले चार पीढियों से इसी काम से जुड़े हुए हैं। इटावा के अरविंद कुमार 20 साल से खजले के कारोबार में जुटे हुए हैं। वैदपुरा के मनोज गुप्ता ने बताया कि वह कई वर्षों से यहां पर खजले की दुकान लगा रहे हैं।
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