{"_id":"5f1a84cc8ebc3e639e0b5198","slug":"agra-ka-sawan-special-story-of-jhele-and-bhujrian","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"आगरा का सावन: ससुर जी बुनते थे झूले की रस्सी, भुजरियां की मिट्टी लाने जाती थीं सात सहेलियां","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आगरा का सावन: ससुर जी बुनते थे झूले की रस्सी, भुजरियां की मिट्टी लाने जाती थीं सात सहेलियां
Fri, 24 Jul 2020 12:25 PM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Fri, 24 Jul 2020 12:25 PM IST
सार
भुजरियां विसर्जन के बाद बस्ती भर में भुजरियां बंधाई जाती थीं
विज्ञापन
- ठाकुर बेटी, बाह (शहीद इंद्रजीत सिंह की मां)
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
62 साल पहले ब्याह कर ससुराल सिमराई गांव आई थी। सावन लगते ही ससुर जी ने झूले के लिए अपने हाथों से रस्सी बुनी थी। बेटियों की तरह झूला झूली थी। मायके में सात सहेलियां भुजरियां बोने के लिए मिट्टी लेने को खेत पर जाती थीं। एक ही गड्ढे से मिट्टी खोदती थीं। शादी की पहली साल आने वाली बेटियों को गड्ढे को सात बार उछल कर पार करना होता था। भुजरियां विसर्जन के लिए गांव के तालाब पर मेला लगता था। भुजरियां विसर्जन के बाद बस्ती भर में भुजरियां बंधाई जाती थी। बदले में उपहार मिलते थे। मायके बाजंदपुर फिरोजाबाद में सावन के झूले का उत्साह शादी के बाद ससुराल में बरकरार रहा।
गड्ढे में बैठी कन्या के वचन से लगाते थे बारिश का अंदाजा
जिस गड्ढे से मिट्टी खोदते थे, उस गड्ढे में कन्या को बैठाकर पूछा जाता था कि साल कैसा रहेगा ? बारिश होगी या अकाल पडे़गा ? कन्या के जवाब के साथ ही साल में अच्छी फसल या सूखे का अंदाजा लगाया जाता था।
पिढी पर उल्टी चपटिया रखकर बनाते थे जवा
पूर्णिमा पर खीर के लिए जवा बनाए जाते थे। सावन लगते ही घर की पिढी के एक पाये पर चपटिया को उल्टा रखकर उसपर जवा (छोटी सेंवई ) बनाए जाते थे। सावन में जवा की खीर के जायके के सामने हर पकवान फीका लगता था।
विज्ञापन
विज्ञापन
गड्ढे में बैठी कन्या के वचन से लगाते थे बारिश का अंदाजा
जिस गड्ढे से मिट्टी खोदते थे, उस गड्ढे में कन्या को बैठाकर पूछा जाता था कि साल कैसा रहेगा ? बारिश होगी या अकाल पडे़गा ? कन्या के जवाब के साथ ही साल में अच्छी फसल या सूखे का अंदाजा लगाया जाता था।
विज्ञापन
पिढी पर उल्टी चपटिया रखकर बनाते थे जवा
पूर्णिमा पर खीर के लिए जवा बनाए जाते थे। सावन लगते ही घर की पिढी के एक पाये पर चपटिया को उल्टा रखकर उसपर जवा (छोटी सेंवई ) बनाए जाते थे। सावन में जवा की खीर के जायके के सामने हर पकवान फीका लगता था।
विज्ञापन
Trending Videos
झूले के लिए पेड़ रहे न विसर्जन को ताल
जीवन के 80 साल में सब कुछ बदल गया है। न तो झूले के लिए पेड़ ही रहे हैं और न भुजरियां विसर्जन के लिए ताल बचे हैं। जवा भी आज की पीढ़ी की महिलाएं नहीं बनाती। गीत मल्हार भी भूल गई हैं। अपनी लोक संस्कृति और परम्पराएं वक्त की करवट के साथ बदल गई हैं। अब रस्म अदायगी में सावन सिमट गया है। - ठाकुर बेटी, बाह (शहीद इंद्रजीत सिंह की मां)
जीवन के 80 साल में सब कुछ बदल गया है। न तो झूले के लिए पेड़ ही रहे हैं और न भुजरियां विसर्जन के लिए ताल बचे हैं। जवा भी आज की पीढ़ी की महिलाएं नहीं बनाती। गीत मल्हार भी भूल गई हैं। अपनी लोक संस्कृति और परम्पराएं वक्त की करवट के साथ बदल गई हैं। अब रस्म अदायगी में सावन सिमट गया है। - ठाकुर बेटी, बाह (शहीद इंद्रजीत सिंह की मां)