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अभिभावकों के काम की खबर: देश में 100 में से एक बच्चे को ऑटिज्म, सामान्य स्कूल में ही स्पेशल बच्चों को भी पढ़ाएं

Mon, 20 Dec 2021 05:45 PM IST
Abhishek Saxena अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
अमर उजाला ब्यूरो, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Mon, 20 Dec 2021 05:45 PM IST
सार

वरिष्ठ बाल रोग डॉ. वीएस कुलश्रेष्ठ ने कहा कि बच्चों पर अटेंशन डिफेक्ट हाइपर एक्टिविटी डिसॉर्डर (एडीएचडी) और ऑटिज्म का लेबल नहीं लगाना चाहिए। इससे बच्चे और उनके परिजनों को परेशानी होती है। ऐसे बच्चों के इलाज के लिए नारकोटिक्स की दवाएं भी उपलब्ध नहीं है। जबकि कुछ मामलों में बच्चे ठीक हो जाते हैं।

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Academy of Pediatrics two days confrence in agra for special kids
सम्मेलन में विशेषज्ञ चिकित्सक - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कोरोना की वजह से बच्चों की वृद्धि, विकास और व्यवहार में आए बदलाव के वजहों और इलाज पर मंथन के लिए एकेडमी ऑफ पीडिएट्रिक्स (आईएपी) व ग्रोथ डेवलपमेंट एंड बिहेवियोरल पीडिएट्रिक्स (जीडीबीपी) की ओर से आयोजित जीडीबीपीकॉन-2021 रविवार को संपन्न हुआ। आखिरी दिन मुंबई की डॉ. अंजना थडानी ने कहा कि स्पेशल बच्चों को भी सामान्य स्कूलों में ही पढ़ाना चाहिए। बच्चों को योग्य बनाना है, दया का पात्र नहीं। 

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स्पेशल बच्चे सामान्य स्कूलों में पढ़ सकते हैं
डॉ. अंजना थडानी ने कहा कि रिवाइज पर्सन्स बिद डिसएबिलिटी एक्ट-2016 के तहत यह नियम भी है कि स्पेशल बच्चे सामान्य स्कूलों में पढ़ सकते हैं। कोई स्कूल स्पेशल बच्चे को प्रवेश देने से मना नहीं कर सकता। प्रवेश न लेने पर जिलाधिकारी व संबंधित विभाग के अधिकारी से शिकायत की जा सकती है। सामान्य स्कूलों में पढ़ने से सामान्य बच्चे खुद को समाज से अलग-थलग महसूस नहीं करेंगे। 
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देखभाल के अभाव में 45 फीसदी बच्चे सही मुकाम तक नहीं पहुंचते
दिल्ली की डॉ. शर्मिला मुखर्जी ने कहा कि बच्चों की उचित देखभाल आज की पीढ़ी के लिए किसी जीवन बीमा से कम नहीं। देश में तीन वर्ष तक के करीब 45 फीसदी बच्चों की सही देखभाल न होने से वे सही मुकाम तक नहीं पहुंच पाते। महज पैसा खर्च करना व बेहतर सुविधाएं देना ही बच्चों के सही विकास की परिभाषा नहीं है। उन्हें अभिभावकों का समय चाहिए। आईएपी की वेबसाइट पर बच्चों के सही देखभाल के संबंध में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आईएपी ने वर्ष 2023 तक करीब 8-10 हजार डॉक्टरों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा है, जो आगे अभिभावकों को प्रशिक्षित करेंगे।

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200 डॉक्टरों ने प्रतिभाग किया
कार्यशाला में करीब 200 डॉक्टरों ने प्रतिभाग किया। 10 शोधपत्र व पोस्टर प्रस्तुत किए गए। समापन समारोह में आयोजन समिति के सदस्यों को स्मृति चिह्न दिया गया। समिति के अध्यक्ष डॉ. प्रदीप चावला, डॉ. आरएन द्विवेदी, अजय श्रीवास्तव, आयोजन सचिव डॉ. अरुण जैन, डॉ. राजीव कृषक, डॉ. मनोज जैन, डॉ. सुनील अग्रवाल, डॉ. राहुल पैंगोरिया, डॉ. स्वाति द्विवेदी, डॉ. सचिन चावला, डॉ. अंजना थडानी, मोनिका शर्मा, जयदीप चौधरी, आईएपी आगरा के अध्यक्ष डॉ. आरएन शर्मा, सचिव डॉ. संजीव अग्रवाल, दिल्ली के डॉ. अनिल ठकवानी उपस्थित रहे। 
बच्चों पर न लगाएं ऑटिज्म का लेबल
वरिष्ठ बाल रोग डॉ. वीएस कुलश्रेष्ठ ने कहा कि बच्चों पर अटेंशन डिफेक्ट हाइपर एक्टिविटी डिसॉर्डर (एडीएचडी) और ऑटिज्म का लेबल नहीं लगाना चाहिए। इससे बच्चे और उनके परिजनों को परेशानी होती है। ऐसे बच्चों के इलाज के लिए नारकोटिक्स की दवाएं भी उपलब्ध नहीं है। जबकि कुछ मामलों में बच्चे ठीक हो जाते हैं।
जनवरी अंत तक आ जाएगा बच्चों का कोरोना टीका
लखनऊ के डॉ. उत्कर्ष बंसल ने बताया कि बच्चों के लिए कोरोना का टीका जायकोव-डी जनवरी तक आने की उम्मीद है। इसको मंजूरी मिल चुकी है। यह 12 से 18 वर्ष तक के बच्चों को लगना है। कुल तीन डोज लगेंगे। 28-28 दिन के अंतराल पर टीका लगाया जाएगा। इस टीके को प्लाज्मा जेट तकनीकी से लगाया जाएगा। इससे दर्द नहीं होगा। 
 

हर 20 मिनट बाद, 20 फुट दूर, 20 सेकेंड तक देखें
आईएपी के अध्यक्ष डॉ. आरएन शर्मा ने कहा कि कोरोना काल में बच्चों में चिड़चिड़ापन, अवसाद बढ़ा है। कुछ बच्चे चंचल (हाईपर एक्टिव) तो कुछ गुमसुम हो रहे हैं। लैपटॉप, मोबाइल आदि से बच्चे भटक रहे हैं। इसे ‘डिजिटल आई स्ट्रेन इन किड्स’ कहा जा रहा है। अभिभावकों को जागरूक किया जाए कि दो वर्ष तक के बच्चों को मोबाइल से दूर रखा जाए, ताकि बच्चे का विकास प्रभावित न हो। दो से आठ वर्ष के बच्चे का स्क्रीन टाइम एक घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए। इसमें टीवी भी शामिल है। 20-20-20 का फार्मूला अपनाना चाहिए। स्क्रीन देखते समय हर 20 मिनट बाद, 20 सेकेंड तक 20 फुट दूर देखना चाहिए। हर एक घंटे बाद पांच मिनट के लिए टहलना चाहिए। 
देश में 100 में से एक बच्चे को ऑटिज्म 
मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, दिल्ली की डॉ. मोनिका जुनेजा ने कहा कि ऑटिज्म की पहचान करना जरूरी होता है। ऐसे बच्चों में एडीएचडी से अलग लक्षण होते हैं। इस बीमारी में बोलना तो आता है पर किसे क्या बोलना है, यह पता नहीं होता। कई मरीज बोल नहीं सकते। सुनने में भी समस्या होती है। देश में 100 में से एक बच्चे को ऑटिज्म होता है। समय से लक्षण पहचानकर इलाज कराना चाहिए।
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