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कागज पर एक डॉलर से सस्ता ‘चीन का जूता’
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 11 Oct 2016 12:35 AM IST
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ड्यूटी से बचने को चीन के अंडर बिलिंग के खेल से भारतीय जूता बाजार हो रहा पस्त
- फोटो : getty images
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आगरा। चीन के जूते की कीमत एक डॉलर से भी कम। है न हैरत की बात, लेकिन कागजों पर तो यही कीमत बताकर घरेलू जूता बाजार में इन्हें खपाया जा रहा है। भारी भरकम इंपोर्ट ड्यूटी से बचने के लिए असली कीमत की जगह अंडर बिलिंग कर न केवल भारतीय खजाने को चोट पहुंचाई जा रही है, बल्कि भारतीय जूता बाजार के सामने भी संकट खड़ा कर दिया है। हाल ये है कि चीन से भारत में खपाए जा रहे जूते की औसत कीमत मात्र 0.79 डॉलर यानी करीब 52 रुपये बताई जा रही है, जबकि भारतीय जूता कम से कम 12 डॉलर प्रति जोड़ी यानी करीब 780 रुपये पर निर्यात किया जा रहा है। चीन का फुटवियर भारतीय बाजार में कितना खपाया जा रहा है, इसका आधिकारिक आंकड़ा तक भारत सरकार के पास नहीं है।
एक तरफ सोशल मीडिया से लेकर देशभर में चीन के उत्पादों के बहिष्कार की चर्चाएं हैं, वहीं दूसरी ओर घरेलू जूता बाजार चीन की चालाकी से पस्त हो रहा है। देश के 65 फीसदी घरेलू जूता बाजार पर काबिज आगरा का जूता उद्योग सबसे ज्यादा चीन की चालाकी से बेदम हो रहा है। घरेलू जूता बाजार में चीन के सस्ते जूते छाए हुए हैं, हालांकि इनकी क्वालिटी और स्वास्थ्य पर असर को लेकर कई सवाल हैं, लेकिन देहात, कस्बों और कई छोटे शहरों पर इनकी हिस्सेदारी बढ़ रही है। चीन का जूता भारतीय बाजार में लागत के दसवें हिस्से की कीमत बताकर भेजा जा रहा है। उसी कीमत पर उसे ड्यूटी का भुगतान करना पड़ रहा है। अगर चीन का जूता असली कीमत पर भारतीय बाजार में आएगा तो यह आगरा के जूते से कहीं ज्यादा महंगा पड़ेगा, लेकिन अंडर बिलिंग के इसी खेल से चीन आगरा के जूता उद्योग को चोट दे रहा है।
चीन, यूरोप में चमड़े के एक्सपोर्ट में गिरावट
एफमेक अध्यक्ष पूरन डावर के मुताबिक, चीन और यूरोप में जूते के लिए चमड़े के निर्यात में गिरावट आ रही है। दो साल पहले 23 फीसदी की गिरावट रही, जबकि पिछले साल 21 प्रतिशत। इस साल ये 17 फीसदी है। आगरा के फुटवियर एक्सपोर्ट में दो साल के बाद पहली बार सकारात्मक बढ़ोतरी हुई है। रुपये में भारतीय निर्यात 6 फीसदी बढ़ा है, लेकिन डॉलर टर्म में इनमें 0.1 फीसदी की गिरावट रही है। भारतीय जूता बाजार के पास इन दिनों अच्छी संभावनाएं हैं। दरअसल, चीन में महंगी लेबर और कच्चा माल महंगा होने का असर कीमतों पर पड़ रहा है। इसके अलावा क्वालिटी को लेकर भी चीन की छवि भी अच्छी नहीं रही। इसके उलट भारतीय जूते की साख दुनिया भर में लगातार बढ़ रही है।
एक तरफ सोशल मीडिया से लेकर देशभर में चीन के उत्पादों के बहिष्कार की चर्चाएं हैं, वहीं दूसरी ओर घरेलू जूता बाजार चीन की चालाकी से पस्त हो रहा है। देश के 65 फीसदी घरेलू जूता बाजार पर काबिज आगरा का जूता उद्योग सबसे ज्यादा चीन की चालाकी से बेदम हो रहा है। घरेलू जूता बाजार में चीन के सस्ते जूते छाए हुए हैं, हालांकि इनकी क्वालिटी और स्वास्थ्य पर असर को लेकर कई सवाल हैं, लेकिन देहात, कस्बों और कई छोटे शहरों पर इनकी हिस्सेदारी बढ़ रही है। चीन का जूता भारतीय बाजार में लागत के दसवें हिस्से की कीमत बताकर भेजा जा रहा है। उसी कीमत पर उसे ड्यूटी का भुगतान करना पड़ रहा है। अगर चीन का जूता असली कीमत पर भारतीय बाजार में आएगा तो यह आगरा के जूते से कहीं ज्यादा महंगा पड़ेगा, लेकिन अंडर बिलिंग के इसी खेल से चीन आगरा के जूता उद्योग को चोट दे रहा है।
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चीन, यूरोप में चमड़े के एक्सपोर्ट में गिरावट
एफमेक अध्यक्ष पूरन डावर के मुताबिक, चीन और यूरोप में जूते के लिए चमड़े के निर्यात में गिरावट आ रही है। दो साल पहले 23 फीसदी की गिरावट रही, जबकि पिछले साल 21 प्रतिशत। इस साल ये 17 फीसदी है। आगरा के फुटवियर एक्सपोर्ट में दो साल के बाद पहली बार सकारात्मक बढ़ोतरी हुई है। रुपये में भारतीय निर्यात 6 फीसदी बढ़ा है, लेकिन डॉलर टर्म में इनमें 0.1 फीसदी की गिरावट रही है। भारतीय जूता बाजार के पास इन दिनों अच्छी संभावनाएं हैं। दरअसल, चीन में महंगी लेबर और कच्चा माल महंगा होने का असर कीमतों पर पड़ रहा है। इसके अलावा क्वालिटी को लेकर भी चीन की छवि भी अच्छी नहीं रही। इसके उलट भारतीय जूते की साख दुनिया भर में लगातार बढ़ रही है।
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