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एक कंप्यूटर पर चल रही पूरी एजेंसी

Wed, 03 Dec 2014 05:30 AM IST
Agra
Agra Updated Wed, 03 Dec 2014 05:30 AM IST
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आगरा। साल 2013 में 40 प्रतिशत छात्रों की मार्कशीट में एमडब्ल्यू, करीब 50 हजार छात्र अभी भी मार्कशीट सुधार को भटक रहे हैं। लेकिन छात्रों को राहत देेने वाली साल 2013 की एजेंसी के पास केवल एक ही कंप्यूटर है। डा. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय के अधिकारी एजेंसी संचालक को 10 टर्मिनल लगाने को कह चुके हैं, लेकिन संचालक के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।
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सूत्र बताते हैं कि पिछले साल की मार्कशीट को सही कराने के लिए तकरीबन 500 छात्र हर रोज विश्वविद्यालय पहुंचते हैं। पिछले साल की मार्कशीट सही करने का जिम्मा संभालने वाली एजेंसी को अधिकारियों ने हाल ही में 65 लाख रुपये का पेमेंट कर दिया है, जिस पर खासा विवाद भी हुआ है। साल 2013 के कई मामले कोर्ट में हैं और एजेंसी आरोपों के घेरे में है। पेमेंट होने के बाद एजेंसी संचालक ने हाथ खडे़ कर दिए हैं और एक कंप्यूटर की बदौलत दिनभर में केवल 40 मार्कशीट में ही वह सुधार कर पा रही है।
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वर्जन -
एजेंसी को टर्मिनल बढ़ाने के लिए कहा गया है। उन्होंने इसका भरोसा भी दिलाया है। टर्मिनल बढे़ंगे तो एजेंसी को ही इसका फायदा होगा और बाकी मामले तेजी से निपटाए जा सकेंगे।
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- डा. मनोज श्रीवास्तव, जनसंपर्क अधिकारी
इनसेट
ऑन लाइन डाटा चोरी का खतरा टला
आगरा। डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के मुख्य सर्वर का लिंक मिल गया है। यह लिंक केवल वेब मास्टर अनुज अवस्थी को ही पता था। जो कि फर्जी मार्कशीट रैकेट चलाने का आरोपी है।

विश्वविद्यालय ने अवस्थी को बतौर वेब मास्टर नियुक्त किया था। इसलिए उसे सभी जरूरी ई-मेल के पासवर्ड और मुख्य सर्वर का लिंक भी पता था। इस लिंक को बाद में उसने बदल दिया। इसके बाद केवल वही मुख्य सर्वर तक पहुंच पाता था। वेबमास्टर के फर्जीवाडे़ की भनक धीरे-धीरे कुलपति के कानों में पहुंचने लगी थी। इसके बाद कंप्यूटर सेल में अवस्थी का प्रवेश वर्जित कर दिया गया। वह लैपटॉप और दूसरी अन्य जगहों से इंटरनेट के जरिये गोरखधंधा चला रहा था। अवस्थी की गिरफ्तारी के बाद भी अधिकारियों को यही डर था कि अगर आरोपी छूटा तो लिंक की मदद से वह डाटा चुरा सकता है या उसमें फेरबदल कर सकता है। इसलिए हार्डवेयर इंजीनियरों को लिंक पता कर उसे बदलने का काम सौंपा गया। कुछ दिन पहले ही इंजीनियरों ने लिंक का पता कर इसे बदल दिया। लेकिन सूत्र बताते हैं कि अब यह लिंक साल 2014 का जिम्मा संभालने वाली एजेंसी के पास है, इससे लिंक के दुरुपयोग की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
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