{"_id":"3-90338","slug":"Agra-90338-3","type":"story","status":"publish","title_hn":"जांच ऐसी, एक भी टीबी किटाणु तो पकड़ा जाएगा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जांच ऐसी, एक भी टीबी किटाणु तो पकड़ा जाएगा
Agra
Updated Sat, 22 Nov 2014 05:30 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आगरा। जांच की लंबी प्रक्रिया के चलते भी ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) के कई मरीज मौत के मुहाने तक पहुंच जाते हैं। कल्चर पद्धति से जांच में डेढ़ महीने से अधिक तो बैकटेक लिक्विड विधि से दो हफ्ते लगते हैं। टीबी के किटाणुओं को जानलेवा रूप अख्तियार करने के लिए इतना वक्त बहुत है। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। ‘जीन एक्सपर्ट’ वह विधि है जिससे जांच रिपोर्ट चंद घंटे में मिल जाएगी। बड़ी बात यह कि रिसर्च प्रमाणित है कि इसकी रिपोर्ट शत-प्रतिशत सही होती है। यहां चल रही इंडियन चेस्ट सोसाइटी की कांफ्रेंस नैपकान-2014 में दूसरे दिन शुक्रवार को टीबी डाइग्नोसिस पर विचार मंथन हुआ।
‘ट्यूबरक्लोसिस: पास्ट, प्रजेंट एंड फ्यूचर’ में नई विधि जीन एक्सपर्ट के बारे में विशेषज्ञों ने बताया कि यह अत्याधुनिक मशीन है, जिसमें टेकभनीशियन की भूमिका लगभग नगण्य है। इससे फेफड़े, दिमाग और पेट की टीबी ही नहीं संभावित मरीज की बल्गम, रीढ़ की हड्डी के पानी और पेट के तरल पदार्थ की जांच भी तीन से पांच घंटे में हो जाती है। आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के पल्मोनरी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डा. रंदीप गुलेरिया ने बताया कि हर साल तीन फीसदी नए मरीज आ रहे हैं। टीबी से हर डेढ़ मिनट में एक मौत हो रही है। मौतों का एक कारण जांच में होने वाली देरी भी है। वर्कशाप में एसएन मेडिकल कालेज के क्षय एवं वक्ष रोग विभागाध्यक्ष डा. संतोष कुमार, डा. जीवी सिंह, डा. विवेक अय्यर, डा. राजेश गुप्ता ने भी व्याख्यान दिए।
डॉट सेंटर पर मिले सुविधा
अभी जीन एक्सपर्ट जांच चुनिंदा शहराें में ही उपलब्ध है। मरीज निचले तबके और गांवों में अधिक हैं। चेस्ट सोसाइटी अध्यक्ष डा. मोहम्मद साबिर ने बताया कि अभी जांच में 15 सौ रुपये लगते हैं। शुल्क कम हो और डॉट सेंटराें पर यह सुविधा दी जाए तो गरीब मरीजों का भला होगा। मृत्यु दर में भी कमी आएगी।
विज्ञापन
बैकटेक से भी सटीक जांच नहीं
टीबी जांच की बैकटेक लिक्विड विधि एसएन मेडिकल कालेज बाल रोग विभाग में परखी गई। इसके अध्ययन के लिए 34 मरीजों की जीन एक्सपर्ट और बैकटेक दोनों तरीके से जांच कराई गई। शोधार्थी डा. शिशिर ने बताया कि बैकटेक से चार तो जीन एक्सपर्ट से जांच में 14 मरीजों में टीबी पुष्टि हुई। विभागाध्यक्ष डा. राजेश्वर दयाल ने बताया कि इस तकनीकी से टीबी का इलाज तत्काल शुरू किया जा सकेगा।
निमोनिया बना ‘कैप्टन आफ डेथ’
ज्यादातर नवजातों की मौत निमोनिया से होने के चलते इसे ‘कैप्टन आफ डेथ’ की संज्ञा दी गई। एम्स के प्रो. जीसी खिल्यानी ने बताया कि निमोनिया में सामान्य बुखार समझ कर इलाज किया जाना ही मौतों का बड़ा कारण है। उन्होंने बताया, दो दिन में बुखार न उतरे और पसली चले तो तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक को दिखाएं।
विज्ञापन
‘ट्यूबरक्लोसिस: पास्ट, प्रजेंट एंड फ्यूचर’ में नई विधि जीन एक्सपर्ट के बारे में विशेषज्ञों ने बताया कि यह अत्याधुनिक मशीन है, जिसमें टेकभनीशियन की भूमिका लगभग नगण्य है। इससे फेफड़े, दिमाग और पेट की टीबी ही नहीं संभावित मरीज की बल्गम, रीढ़ की हड्डी के पानी और पेट के तरल पदार्थ की जांच भी तीन से पांच घंटे में हो जाती है। आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के पल्मोनरी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डा. रंदीप गुलेरिया ने बताया कि हर साल तीन फीसदी नए मरीज आ रहे हैं। टीबी से हर डेढ़ मिनट में एक मौत हो रही है। मौतों का एक कारण जांच में होने वाली देरी भी है। वर्कशाप में एसएन मेडिकल कालेज के क्षय एवं वक्ष रोग विभागाध्यक्ष डा. संतोष कुमार, डा. जीवी सिंह, डा. विवेक अय्यर, डा. राजेश गुप्ता ने भी व्याख्यान दिए।
विज्ञापन
डॉट सेंटर पर मिले सुविधा
अभी जीन एक्सपर्ट जांच चुनिंदा शहराें में ही उपलब्ध है। मरीज निचले तबके और गांवों में अधिक हैं। चेस्ट सोसाइटी अध्यक्ष डा. मोहम्मद साबिर ने बताया कि अभी जांच में 15 सौ रुपये लगते हैं। शुल्क कम हो और डॉट सेंटराें पर यह सुविधा दी जाए तो गरीब मरीजों का भला होगा। मृत्यु दर में भी कमी आएगी।
विज्ञापन
बैकटेक से भी सटीक जांच नहीं
टीबी जांच की बैकटेक लिक्विड विधि एसएन मेडिकल कालेज बाल रोग विभाग में परखी गई। इसके अध्ययन के लिए 34 मरीजों की जीन एक्सपर्ट और बैकटेक दोनों तरीके से जांच कराई गई। शोधार्थी डा. शिशिर ने बताया कि बैकटेक से चार तो जीन एक्सपर्ट से जांच में 14 मरीजों में टीबी पुष्टि हुई। विभागाध्यक्ष डा. राजेश्वर दयाल ने बताया कि इस तकनीकी से टीबी का इलाज तत्काल शुरू किया जा सकेगा।
निमोनिया बना ‘कैप्टन आफ डेथ’
ज्यादातर नवजातों की मौत निमोनिया से होने के चलते इसे ‘कैप्टन आफ डेथ’ की संज्ञा दी गई। एम्स के प्रो. जीसी खिल्यानी ने बताया कि निमोनिया में सामान्य बुखार समझ कर इलाज किया जाना ही मौतों का बड़ा कारण है। उन्होंने बताया, दो दिन में बुखार न उतरे और पसली चले तो तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक को दिखाएं।