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आगराः आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर 'आधी आबादी', एक साल में रोजगार से जुड़ी 95 हजार महिलाएं

Sun, 06 Dec 2020 11:27 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Sun, 06 Dec 2020 11:27 AM IST
सार

  • ग्रामीण क्षेत्र की आधी आबादी में बढ़ी रोजगार के प्रति जागरूकता
  • जूता, डेयरी, मोमबत्ती, दरी गलीचा, चूड़ियां बनाकर हो रही आत्म निर्भर 
  • राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में बन चुके हैं महिलाओं के 8448 समूह 

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95 Thousand Women Joined Employment Within One Year In Agra
स्वयं सहायता समूह की महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कभी गांव की महिलाएं अपने खर्च के लिए पुरुषों पर ही निर्भर रहती थीं। मगर, अब ऐसा नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं स्वरोजगार करके आत्मनिर्भर बन रही हैं। एक साल के अंदर स्वयं सहायता समूहों से 95 हजार से ज्यादा महिलाएं जुड़कर न केवल स्वरोजगार कर रही हैं, बल्कि वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी बन चुकी हैं। कई समूहों का कारोबार तो बाहर भी अपनी धाक जमा चुका है। 
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केस एक
बरौली ब्लॉक के गांव कोलखा की कमलेश कुमारी ने एक साल पहले 12 महिलाओं को इकट्ठा करके समूह बनाया। समूह ने जूता निर्माण का काम शुरू किया। कोरोना काल में भी इनके काम पर असर नहीं पड़ा। अब हर माह समूह की आमदनी 50 हजार से ऊपर है। जूते का कारोबार आगरा से बाहर भी फैलने लगा है।
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केस दो
बगदा गांव की अवधेश यादव ने भी 10 महीने पहले गांव की आठ महिलाओं का समूह बनाया। समूह को बिजली के बिल काटने और बाल पोषाहार उठाने का काम मिला। समूह की महिलाओं को एक बिल वसूली पर 20 रुपये मिलते हैं। 2000 रुपये से ऊपर की वसूली पर एक प्रतिशत कमीशन है। अब यह महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।
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केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) योजना वर्ष 2014 में आई थी। तब महिलाओं में समूह गठन के प्रति जागरूकता नहीं थी। प्रारंभ में छह ब्लॉकों में कुछ समूह ही बन पाए। मगर, बीते एक साल समूह तेजी से बने। वर्ष 2019-20 में अकोला, बाह, एत्मादपुर, जगनेर, जैतपुर कला, खैरागढ़, पिनाहट, सैया और शमशाबाद ब्लॉकों में आठ हजार से ज्यादा समूह बनाकर 95 हजार महिलाएं स्वरोजगार से जुड़ चुकी हैं। बैंकों की आर्थिक मदद से समूहों की आमदनी भी कई गुना बढ़ गई है। 

काम का दायरा भी बढ़ा 
सरकार ने स्वयं सहायता समूहों के काम का दायरा भी बढ़ाया है। अब समूह की महिलाएं मोमबत्ती, दरी गलीचा, जूता चप्पल निर्माण, कढ़ाई-बुनाई, चूड़ियां बनाना, पशुपालन, डेयरी बिजली बिल वसूली, बाल पोषाहार के पैकट बनाकर खासी कमाई करती हैं। वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक डेढ़ लाख महिलाओं को रोजगार देने का लक्ष्य है। 

समूह गठन का तरीका
गांव की कोई भी महिला साथी महिलाओं को जोड़कर समूह बना सकती है। ब्लॉक में पंजीकरण कराना होता है। बैंक में समूह का कैश क्रेडिट लिमिट (सीसीएल) खुलता है। समूहों को 4 प्रतिशत ब्याज पर ऋण आसानी से मिलता है। तीन साल में ऋण देने की सीमा छह लाख तक है। साख ठीक रहने पर 10 लाख का लोन मिल सकता है। 

500 समूहों को मिला सखी कैडर
बेहतर काम करने पर 500 समूहों को सखी कैडर मिला है। कैडर की महिलाएं नए समूह बनवाकर अन्य महिलांओं को रोजगार के लिए प्रेरित करती हैं। -मानवेंद्र सिंह, प्रबंधक, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन 
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