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सांस फूलते ही मरीज को रेफर कर देते हैं डाक्टर
Updated Sun, 13 Aug 2017 12:15 AM IST
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ऑक्सीजन सिंलेंडर
- फोटो : अमर उजाला
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मथुरा। मरीज की जरा सी सांस उखड़ीं नहीं कि डाक्टर उसे हायर सेंटर रेफर कर देते हैं। बीपी लड़खड़ा जाए या ईसीजी बिगड़े तत्काल गंभीर हालत बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। हाल यह है कि जिला अस्पताल रेफर सेंटर बन चुका है। यहां से हर माह करीब 200 मरीज रेफर किए जाते हैं। यही वजह है कि आक्सीजन की खपत नहीं है। यहां एक महीने में 20 सिलेंडर भी खर्च नहीं हो पा रहे हैं।
जिला अस्पताल खुद ‘वेंटिलेटर’ पर है। यहां न डाक्टर हैं और न ही इमरजेंसी सेवाओं में प्रयोग होने वाली मशीनें। ब्लड सेपरेशन यूनिट पिछले एक साल से बंद है। यदि किसी को प्लेटलेट्स या प्लाज्मा की जरूरत पड़ गई तो नहीं मिल सकेगा। यदि कोई जला मरीज पहुंचा तो उसका भी उपचार नहीं हो पाता। अस्पताल में कोई प्लास्टिक सर्जन भी नहीं है। इमरजेंसी में डाक्टरों के तीन पद हैं, लेकिन केवल एक डाक्टर काम कर रहा है। पिछले दिनों एक डाक्टर इमरजेंसी ड्यूटी पर नहीं पहुंचा तो पूरी रात मरीज तड़पते रहे, कोई उनका हाल जानने पहुंचा ही नहीं। रेडियोलॉजिस्ट और स्टॉफ के पद खाली होने के चलते अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे भी जुगाड़ से कराए जा रहे हैं।
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक जिला अस्पताल डॉ. अमिताभ पांडेय का कहना है कि अस्पताल में ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में हैं, जब कभी मरीज को आवश्यकता होती है हम सिलेंडर से उसे ये सुविधा उपलब्ध कराते हैं। बेड पर फिटिंग से ऑक्सीजन की सप्लाई की व्यवस्था है, लेकिन ऑक्सीजन की आवश्यकता किसी-किसी मरीज को होती है ऐसे में पूरे सिस्टम को चलाना संभव नहीं हो पाता। अन्य आवश्यकताओं के लिए लखनऊ के अफसरों को लिखा जाता रहा है। निरीक्षण के दौरान सरकार के प्रतिनिधियों, मंत्रियों आदि को समस्याएं बताते हैं। इमरजेंसी में चिकित्सकों की कमी भी स्वास्थ्य सेवाओं में परेशानी खड़ी करती है।
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- डा. अमिताभ पांडेय, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्पताल मथुरा
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जिला अस्पताल खुद ‘वेंटिलेटर’ पर है। यहां न डाक्टर हैं और न ही इमरजेंसी सेवाओं में प्रयोग होने वाली मशीनें। ब्लड सेपरेशन यूनिट पिछले एक साल से बंद है। यदि किसी को प्लेटलेट्स या प्लाज्मा की जरूरत पड़ गई तो नहीं मिल सकेगा। यदि कोई जला मरीज पहुंचा तो उसका भी उपचार नहीं हो पाता। अस्पताल में कोई प्लास्टिक सर्जन भी नहीं है। इमरजेंसी में डाक्टरों के तीन पद हैं, लेकिन केवल एक डाक्टर काम कर रहा है। पिछले दिनों एक डाक्टर इमरजेंसी ड्यूटी पर नहीं पहुंचा तो पूरी रात मरीज तड़पते रहे, कोई उनका हाल जानने पहुंचा ही नहीं। रेडियोलॉजिस्ट और स्टॉफ के पद खाली होने के चलते अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे भी जुगाड़ से कराए जा रहे हैं।
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मुख्य चिकित्सा अधीक्षक जिला अस्पताल डॉ. अमिताभ पांडेय का कहना है कि अस्पताल में ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में हैं, जब कभी मरीज को आवश्यकता होती है हम सिलेंडर से उसे ये सुविधा उपलब्ध कराते हैं। बेड पर फिटिंग से ऑक्सीजन की सप्लाई की व्यवस्था है, लेकिन ऑक्सीजन की आवश्यकता किसी-किसी मरीज को होती है ऐसे में पूरे सिस्टम को चलाना संभव नहीं हो पाता। अन्य आवश्यकताओं के लिए लखनऊ के अफसरों को लिखा जाता रहा है। निरीक्षण के दौरान सरकार के प्रतिनिधियों, मंत्रियों आदि को समस्याएं बताते हैं। इमरजेंसी में चिकित्सकों की कमी भी स्वास्थ्य सेवाओं में परेशानी खड़ी करती है।
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- डा. अमिताभ पांडेय, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्पताल मथुरा