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हवा की रफ्तार के साथ दौड़ी लपटें, आंखों के सामने हुई तबाही
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हवा की रफ्तार के साथ दौड़ी लपटें, आंखों के सामने हुई तबाही
- फोटो : अमर उजाला
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पटियाली। आंखों के सामने बर्बादी होती रही और तबाही के आंसू छलक पड़े। आग लगने के बाद घर से लेकर गलियों तक भगदड़ मची थी। दो गांव में कोहराम मचा हुआ था। कोई सामान को सुरक्षित करने की कोशिश में जुटा था तो कोई बच्चे और पशुओं को सुरक्षित कर रहा था।
गांव नगला महरी से उठी आग की लपटें हवा के रुख के साथ रफ्तार पकड़ती गईं। पप्पू के घर से उठी चिंगारी ने पहले गांव महरी के 35 घर राख कर दिए और इसके बाद आग की लपटें कूड़े करकट को जलाती हुईं नगला टिकुरी तक पहुंच गईं। यहां भी आग ने 30 घरों को अपने आगोश में ले लिया। आग की विकरालता ने लोगों का दिल दहला दिया। घरों से गलियों में निकले लोग खेतों की ओर दौड़े और खेतों पर लगे पंपिंग सेट शुरू कर दिए। कोई फावड़े से मिट्टी खोदकर आग पर काबू पाने का प्रयास कर रहा था तो कोई पानी डाल रहा था। सूचना पर पहुंची पुलिस और राजस्व कर्मी भी आग बुझाने में जुट गए, लेकिन आग का तांडव कम नहीं हुआ। महिलाएं, पुरुष सिसक रहे थे तो गलियों में बच्चों का क्रंदन हो रहा था। चार घंटे बाद आग बुझने पर लोगों ने राहत की सांस ली।
राख में तलाश रहे थे उम्मीद
पटियाली। आग के ठंडा होने के बाद ग्रामीण महिलाएं और बच्चे जले सामान की राख को इकट्ठा कर हाथों से कुरेदकर ढूंढ रहे थे कि शायद कुछ बचा हो तो मिल जाए। राख के ढेर में कुछ भी हाथ नहीं लगा। अग्निकांड से उनकी सब उम्मीदे जल चुकी थीं।
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गांव नगला महरी से उठी आग की लपटें हवा के रुख के साथ रफ्तार पकड़ती गईं। पप्पू के घर से उठी चिंगारी ने पहले गांव महरी के 35 घर राख कर दिए और इसके बाद आग की लपटें कूड़े करकट को जलाती हुईं नगला टिकुरी तक पहुंच गईं। यहां भी आग ने 30 घरों को अपने आगोश में ले लिया। आग की विकरालता ने लोगों का दिल दहला दिया। घरों से गलियों में निकले लोग खेतों की ओर दौड़े और खेतों पर लगे पंपिंग सेट शुरू कर दिए। कोई फावड़े से मिट्टी खोदकर आग पर काबू पाने का प्रयास कर रहा था तो कोई पानी डाल रहा था। सूचना पर पहुंची पुलिस और राजस्व कर्मी भी आग बुझाने में जुट गए, लेकिन आग का तांडव कम नहीं हुआ। महिलाएं, पुरुष सिसक रहे थे तो गलियों में बच्चों का क्रंदन हो रहा था। चार घंटे बाद आग बुझने पर लोगों ने राहत की सांस ली।
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राख में तलाश रहे थे उम्मीद
पटियाली। आग के ठंडा होने के बाद ग्रामीण महिलाएं और बच्चे जले सामान की राख को इकट्ठा कर हाथों से कुरेदकर ढूंढ रहे थे कि शायद कुछ बचा हो तो मिल जाए। राख के ढेर में कुछ भी हाथ नहीं लगा। अग्निकांड से उनकी सब उम्मीदे जल चुकी थीं।
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